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80 साल का आसाराम दुष्कर्मी, अब बाकी जिंदगी जेल में ही कटेगी

Kadma News - 16 साल की लड़की से दुष्कर्म के दोषी 80 साल के आसाराम को जोधपुर की अदालत ने बुधवार को आजीवन कारावास की सजा सुनाई। यानी...

Dainik Bhaskar

Apr 26, 2018, 02:40 AM IST
80 साल का आसाराम दुष्कर्मी, अब बाकी जिंदगी जेल में ही कटेगी
16 साल की लड़की से दुष्कर्म के दोषी 80 साल के आसाराम को जोधपुर की अदालत ने बुधवार को आजीवन कारावास की सजा सुनाई। यानी दुष्कर्मी आसाराम की बची हुई जिंदगी अब कैदी नंबर 130 के रूप में जोधपुर जेल में कटेगी। एससी-एसटी कोर्ट के जज मधुसूदन शर्मा ने आसाराम के छिंदवाड़ा गुरुकुल की वार्डन शिल्पी और डायरेक्टर शरत चंद्र को भी 20-20 साल की सजा सुनाई है। साजिश के तहत यही लोग छात्रा को आसाराम के पास ले गए थे। हालांकि, आरोप साबित नहीं होने पर दो अन्य आरोपी सेवादार शिवा और रसोइया प्रकाश बरी कर दिए गए। जोधपुर सेंट्रल जेल में बनी अस्थायी अदालत ने सुबह करीब 10.30 बजे आसाराम को दोषी करार दिया। उसके वकीलों ने अधिक उम्र का हवाला देकर कम सजा की मांग की। वहीं, अभियोजन पक्ष ने कहा कि आसाराम कोई संत नहीं है। उसने साजिश के तहत पीड़िता को हॉस्टल से बुलाकर दुष्कर्म किया। अासाराम के वकीलों की दलीलें खारिज करते हुए जज ने कहा कि यह घिनौना अपराध पीड़ित ही नहीं, बल्कि पूरे समाज के खिलाफ है। उसे मौत तक जेल में रहना होगा। शेष | पेज 11 पर

आसाराम को कुल छह अपराधों के लिए मिली सजा

1 आईपीसी की धारा 370 (4)- नाबालिग की तस्करी

सजा: 10 साल का कठोर कारावास, 1 लाख रुपए जुर्माना। जुर्माना नहीं दिया तो एक साल जेल और।

2 आईपीसी की धारा 342 - बंधक बनाकर रखना

सजा: एक साल का कठोर कारावास व 1 हजार रु. जुर्माना। जुर्माना नहीं दिया तो एक माह जेल और।




3 आईपीसी की धारा 506 - धमकी देना

सजा: एक साल का कठोर कारावास और एक हजार रुपए जुर्माना। जुर्माना नहीं देने पर एक माह जेल और।

4 आईपीसी की धारा 376(2) एफ - नाबालिग से दुष्कर्म

सजा: आजीवन कारावास। 1 लाख रु. जुर्माना। नहीं दिया तो एक साल जेल और।

दोषी साबित होने पर आसाराम ने ठहाका लगाया, सजा सुन फूट-फूटकर रोया

अदालत ने सुबह करीब 10.30 बजे जैसे ही आसाराम को दुष्कर्म का दोषी करार दिया, उसने जोर से ठहाका लगाया। फिर एकाएक मायूस हुआ और सिर पकड़कर बैठ गया। फिर वह हरिओम, हरिओम का जाप करने लगा। कोर्टरूम में सुनवाई के दौरान वह बरी किए गए अपने सेवादार शिवा के कंधे का सहारा लिए भी दिखा। दोपहर बाद करीब 2.30 बजे जज ने जब उम्रकैद की सजा सुनाई तो आसाराम फूट-फूटकर रोने लगा। करीब 10 मिनट तक वह कोर्टरूम में कुर्सी पर बैठा रोता रहा। पगड़ी भी खींचकर उतार दी। लेकिन जब पुलिसकर्मी उसे बैरक में ले जाने लगे तो कहा- मैं तो जेल में मौज करूंगा।

आगे क्या

आसाराम के वकीलों ने कहा है कि वे इस फैसले को हाईकोर्ट में चुनौती देंगे। उधर, सूरत में भी आसाराम के खिलाफ दुष्कर्म केस पेंडिंग है। उसे गुजरात शिफ्ट किया जा सकता है। तीन साल पहले गुजरात पुलिस उसे ट्रायल के लिए लेने आई थी। तब जोधपुर की अदालत ने इससे रोकते हुए कहा था कि पहले जोधपुर केस का ट्रायल पूरा किया जाए।

केस हाईकोर्ट जाएगा, आसाराम भी गुजरात शिफ्ट हो सकता है

5 आईपीसी की धारा 376(डी)- गिरोह बना कर दुष्कर्म

सजा: आजीवन कारावास। 1 लाख रुपए जुर्माना। नहीं दिया तो एक साल जेल और।

6 जुवेनाइल जस्टिस एक्ट की धारा 23 - नाबालिग पर क्रूरता

सजा: छह माह के साधारण कारावास की सजा।



पीड़िता के पिता ने कहा- 5 साल से इसका इंतजार था


आस्था के उत्पीड़न का वीभत्स नृत्य समाप्त

एक नन्हीं मासूम का उत्पीड़न कर, स्वयंभू आसाराम नृत्यरत था। अहंकार में चूर। असंख्य अनुयाइयों की आस्था का आपराधिक दुरुपयोग कर, कानून का मखौल उड़ा रहा था।

किन्तु विशेष अजा-जजा न्यायालय ने आसाराम को मृत्यु पर्यन्त सींखचों के पीछे डालने का फैसला कर एक नई आशा जगा दी है। हां, यदि यह आजीवन कारावास न होता तो वैसी आशा नहीं जगती।

यह फैसला अभूतपूर्व है। स्पष्ट है। प्रेरक है। न्यायोचित है।

यह उस समय आया है, जब समूचा राष्ट्र बच्चियों-महिलाओं की गरिमा पर हो रहे पाश्विक हमलों से आहत और उद्वेलित है। असुरक्षा और अविश्वास का वातावरण बन गया है।

आसाराम जैसे प्रभावशाली, शक्तिशाली और वैभवशाली दुष्कर्म आरोपी का कानून की बेड़ियों में जकड़ा जाना ही अविश्वसनीय था। अंधश्रद्धा विराट होती है। किसी सच और तर्क को नहीं मानती। और आस्था से ऊपर कानून रखने की हिम्मत जुटाना मुश्किल काम है। जोधपुर पुलिस ने किन्तु ऐसा ही किया। कई बाधाएं आईं। तीन-तीन गवाहों की हत्या हो गई। किन्तु पुलिस व अभियोजन ने मूल साक्ष्य मिटने न दिए। पुलिस के कर्तव्य विमुख होने के कारनामों से भरा पड़ा भारतीय इतिहास, अासाराम प्रकरण में जोधपुर पुलिस की अच्छी भूमिका को याद रखेगा।

पीड़ित बच्ची और परिवार ने सबसे बड़ा साहस दिखाया। लड़े।

सर्वोच्च प्रशंसा की जानी चाहिए न्यायालय की। जज मधुसूदन शर्मा ने इस न्याय से समूचे दुष्कर्म-विरोधी माहौल को कानूनी मजबूती प्रदान की है। जो इसलिए आवश्यक है, चूंकि लोगों की आशाओं का अंतिम केंद्र कोर्ट ही है। न्याय का मार्ग दुरूह, लम्बा और संताप भरा होता है। बस, चलने वाला चाहिए। इस बार सभी दृढ़ता से चले। चलते रहे।

न्यायालय ने जर्जर बूढ़ी हो चुकी उस रहम की अपील को खारिज कर बहुत अच्छा किया जिसमें आसाराम की वृद्धावस्था का भावुक उल्लेख किया गया था। राम रहीम भी ऐसे ही अपने सामाजिक कार्यों के कवच को दया का भिक्षा-पात्र बनाकर कोर्ट में लाया था। आशा है, कम उम्र के दुष्कर्मियों की इससे रूह कांप उठेगी।

अब राष्ट्र का न्याय में नए सिरे से विश्वास जगा है। बनाए रखने की चुनौती है। प्रश्न केवल इतना है कि कहीं यह केवल आसाराम तक सीमित न रह जाए। हजारों दुष्कर्मी चारों ओर स्वच्छंद फैले हैं। अधिकांश दो-दो बार ऐसा पाप कर चुके हैं। वे बचे क्यों रहते हैं?

प्रत्येक पुलिस वाले को यह अवसर प्रेरणा देना चाहिए। कि राष्ट्र उन्हें देख रहा है। अभियोजन का उत्साहवर्धन होना चाहिए कि न्यायालय में क्या मान्य होगा, कैसे मान्य होगा - सबकुछ उन्हीं पर है।

और जैसे दुष्कर्म की नई परिभाषा नए कानून में लिखी गई वैसे ही न्यायालय, न्याय की ऐसी ही सुस्पष्ट परिभाषा लिखते रहेंगे। और इन सबके लिए हमेशा आरोपी आसाराम जैसा पैसे वाला-जनाधार वाला हो, ऐसा नहीं होगा। कि जिस पर मुकदमा चलने और सजा देने पर इतना प्रचार और प्रशंसा ही मिले।

भास्कर संपादकीय

कल्पेश याग्निक

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