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दुष्कर्म के खिलाफ कड़े कानून ही काफी नहीं

पहले जम्मू-कश्मीर के दो भाजपा मंत्रियों के इस्तीफे, फिर उत्तर प्रदेश के भाजपा विधायक की गिरफ्तारी और अब आसाराम को...

Danik Bhaskar | Apr 28, 2018, 02:45 AM IST
पहले जम्मू-कश्मीर के दो भाजपा मंत्रियों के इस्तीफे, फिर उत्तर प्रदेश के भाजपा विधायक की गिरफ्तारी और अब आसाराम को मिली उम्र-कैद ने दुष्कर्म को इतनी राष्ट्रीय चिंता का विषय बना दिया है कि सरकार को दुष्कर्म-विरोधी अध्यादेश जारी करना पड़ा। दुष्कर्मियों के साथ सरकार की भी कड़ी निंदा होने लगी। संयुक्त राष्ट्र तक भारत की शिकायत गई। न्यूयॉर्क और लंदन के अखबारों ने संपादकीय लिखकर इन दुष्कर्मों की भर्त्सना की। 2013 में हुए ‘निर्भया कांड’ के बाद अब दुष्कर्म पर देश का गुस्सा फिर फूटा है।

यदि इन घटनाओं से नेताओं और कुख्यात ‘संत’ का संबंध नहीं होता तो ये भी दरी के नीचे सरक जातीं। 2016 में बच्चियों के साथ हुए दुष्कर्मों की संख्या 64,138 थी। ये वे हैं, जिनकी रिपोर्ट लिखवाई गई है। डर और बदनामी के मारे हजारों दुष्कर्मों को छिपा लिया जाता है। दुष्कर्म के मुकदमों में मुश्किल से 3-4 प्रतिशत को सजा मिलती है। बच्चियों से दुष्कर्म करने वालों में 98 प्रतिशत लोग उनके रिश्तेदार होते हैं या परिचित! ‘निर्भया कांड’ के बाद बने सख्त कानून के बावजूद 2015-16 में बाल-दुष्कर्म में 82 प्रतिशत की वृद्धि हुई।

दुष्कर्म रोकने के लिए सरकार ने अब कानून को पहले से भी ज्यादा सख्त बना दिया है। यह स्वागत योग्य है लेकिन, क्या सिर्फ कानून को सख्त बना देना काफी है ? पहले इस कानून पर ही विचार करें। यह प्रावधान तो सराहनीय है कि दुष्कर्म के लिए न्यूनतम सजा 7 वर्ष की बजाय 10 वर्ष कर दी गई है और मृत्युदंड को अधिकतम सजा कर दिया गया है। लेकिन, अलग-अलग उम्र की लड़कियों से दुष्कर्म करने पर अलग-अलग सजा का प्रावधान क्यों? 12 वर्ष से कम की लड़की से दुष्कर्म पर मृत्युदंड, 16 वर्ष से कम हो तो उम्र-कैद! यदि वह महिला 70 वर्ष की हो तो दुष्कर्मी की सजा क्या बहुत कम हो जाएगी? उम्र से दुष्कर्म का क्या लेना-देना? हर दुष्कर्मी को कठोरतम सजा मिलनी चाहिए।

यह प्रावधान बहुत अच्छा है कि दुष्कर्मी को अग्रिम जमानत नहीं दी जाएगी लेकिन, यह देखना होगा कि इसकी आड़ में निर्दोष लोगों का फंसाया न जाए। यह भी प्रावधान है कि दो माह में उनकी जांच होगी और दो माह में मुकदमे का फैसला आ जाएगा। अपील भी छह माह से ज्यादा नहीं खिंचेगी। ये प्रावधान देखने में अच्छे लगते हैं लेकिन, इन्हें सरकार लागू कैसे करेगी? हर जिले में विशेष अदालत कैसे बनाएगी? इतने जज व कारकून कहां से लाएगी? दुष्कर्म के मौजूदा मुकदमे निपटाने में ही कम से कम 20 साल लगेंगे। देश की अदालतों में लगभग तीन करोड़ मुकदमे अधर में लटके हुए हैं।

यूं भी दुष्कर्मियों को सजा देना आसान नहीं है। दुष्कर्म कौन करता है? बलवान करता है। प्रायः मालदार, नेता, अधिकारी, रसूखदार, प्रभावशाली, बलशाली लोग ही ज्यादातर ऐसे कर्म करते हैं। वे अपने बचाव के लिए साम, दाम, दंड, भेद का प्रयोग करते हैं। आसाराम के मामले को ही लगभग पांच साल लग गए। सजा से बचने के लिए क्या-क्या गोटियां नहीं खेली गईं? तीन गवाहों की हत्या कर दी गई। शेष की जान खतरे में डाल दी गई। उन्हें करोड़ों रुपए की रिश्वत देने की कोशिश की गई। जमानत के लिए सर्वोच्च न्यायालय पर डोरे डाले गए। खराब स्वास्थ्य के फर्जी प्रमाण-पत्र पेश किए गए। सरकार और अदालतों पर दबाव डालने के लिए प्रदर्शन करवाए गए। जब इन हथकंडों से भी बात नहीं बनी तो कुछ नेताओं से कहकर सारे मामले को साम्प्रदायिक रंग देने की कोशिश की गईं किसी हिंदू संत को ही क्यों फंसाया जा रहा है। यदि कोई दुष्कर्मी सचमुच का संत हो और उससे एेसा अपराधा हो गया हो तो वह खुद प्रायश्चित करेगा, अपने लिए सजा-ए-मौत मांगेगा और सजा के पहले ही वह आत्महत्या कर लेगा।

मैं तो शहाजहांपुर की उस बहादुर बेटी, उसके माता-पिता और उन सब गवाहों की हिम्मत की दाद देता हूं, जिन्होंने जान की परवाह किए बिना यह मुकदमा लड़ा। लेकिन, मैं पूछता हूं कि देश में ऐसे बहादुर लोग कितने हैं? कानून तो आपने कठोर बना दिया लेकिन, लोग तो नरम हैं। दुष्कर्मी रिश्तेदार को सजा-ए-मौत होगी, यह सुनकर ही लोग अपनी बच्ची के मुंह पर क्या पट्‌टी नहीं बांध देंगे? यदि मुकदमा लड़ने का इरादा बना भी लिया तो वे पैसा कहां से लाएंगे? जिन लड़कियों और महिलाओं के साथ दुष्कर्म होता है, उनमें से ज्यादातर गरीब, ग्रामीण, अशिक्षित, पिछड़ी और अनुसूचित जाति की होती हैं। उनकी रक्षा भारत की यह खर्चीली न्याय-प्रणाली कैसे कर सकती है? यह न्याय-प्रणाली खर्चीली ही नहीं है बल्कि जादू-टोने की तरह है। यह ऊपर से नीचे तक अंग्रेजी के कीचड़ में सनी हुई है। वकील क्या बहस कर रहा है और जज क्या फैसला कर रहा है, यह मुवक्किल को पता ही नहीं चलता यदि देश में दुष्कर्म-जैसे अपराध घटाने हैं तो सबसे पहले न्याय-व्यवस्था में क्रांतिकारी परिवर्तन करने होंगे। इसके साथ-साथ दुष्कर्म की सजा को ऐसी भयंकर बनानी होगी कि किसी भी भावी दुष्कर्मी की हड्‌डियों में कंपकंपी दौड़ने लगे। दुष्कर्म पर किसी को उम्र-कैद या फांसी की सजा दी जाए और उसे जेल में ही चुपचाप भुगता दिया जाए तो उसका असर क्या होगा? उसका समाज में गहरा और व्यापक असर हो, इसके लिए जरूरी है कि यह सजा दिल्ली के लाल किले या विजय चौक पर दी जाए। जो लोग मृत्युदंड का विरोध इसलिए करते हैं कि उसका कोई स्पष्ट असर समाज पर दिखाई नहीं पड़ता, वे ठीक कहते हैं। समाज पर असर का रास्ता मैंने सुझाया है।

इसके बावजूद दुष्कर्मों पर नियंत्रण सिर्फ कानून से नहीं हो सकता। क्या हमने कभी सोचा कि इन बढ़ते हुए दुष्कर्मों के लिए इंटरनेट, अर्धनग्न विज्ञापनों, अश्लील फिल्मों, साहित्य और दृश्यावलियों तथा संस्काररहित शिक्षा की जिम्मेदारी कितनी है? सबसे ज्यादा है। इन पर कठोर प्रतिबंध की जरूरत है। अफ्रीका के कुछ देशों में व्याप्त दुष्कर्म को रोकने के लिए पाठशालाओं में लड़कियों को मुठभेड़ करने का प्रशिक्षण दिया जाता है और लड़कों से उनकी रक्षा का व्रत लिवाया जाता है। उसके चमत्कारी परिणाम सामने आए हैं। भारत की प्राचीन शिक्षा-प्रणाली में ब्रह्मचर्य का अत्यधिक महत्व था लेकिन, अब तो उसका नाम लेने में भी हमारे नेताओं को संकोच होता है। उस शिक्षा-प्रणाली में बच्चों को सिखाया जाता है कि ‘मातृवत परदारेषु’ याने पराई स्त्री को माता के समान समझो। जब तक हमारी न्याय व्यवस्था और शिक्षा-व्यवस्था में बुनियादी सुधार नहीं होंगे, दुष्कर्म पर नियंत्रण कर पाना लगभग असंभव ही होगा। (ये लेखक के अपने विचार हैं।)

वेदप्रताप वैदिक भारतीय विदेष नीति परिषद के अध्यक्ष

dr.vaidik@gmail.com