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स्टारडम और बाबाडम : डमडम डीगा डीगा डम

राजपाल यादव के बैंक में यथेष्ठ धन नहीं होने के बावजूद उन्होंने चेक जारी किए जिनका भुगतान नहीं हो पाने के अपराध में...

Bhaskar News Network | Last Modified - Apr 27, 2018, 03:20 AM IST

स्टारडम और बाबाडम : डमडम डीगा डीगा डम
राजपाल यादव के बैंक में यथेष्ठ धन नहीं होने के बावजूद उन्होंने चेक जारी किए जिनका भुगतान नहीं हो पाने के अपराध में उन्हें अदालत ने जेल भेज दिया है। इसी समय एक स्वयंभू बाबा को यौन उत्पीड़न और कत्ल के अपराध में आमरण जेल की सजा सुनाई गई है। एक के पास धनाभाव था, दूसरे के पास धन की विपुलता। धन की विपुलता के साथ ही यौन कामनाएं बढ़ गईं और अध्यात्म के पाखंड का पर्दाफाश हो गया। बाबाडम स्टारडम से अधिक भयावह साबित हो रहा है। दरअसल, बाबा बनने के लिए भी नेता बनने की तरह अभिनय क्षमता का होना आवश्यक है। अवाम भी अपने को वैसा दिखाना चाहता है जैसा वह नहीं है गोयाकि अभिनय हर क्षेत्र में सतत जारी है।

विगत वर्षों में धार्मिक स्थानों पर आने वालों की संख्या में इजाफा हुआ है। जीवन के असमान संघर्ष के कारण अवाम के मन में चमत्कार की आशा पैदा होती है या किसी अवतार के प्रकट होने की कामना होती है। आर्थिक खाई से ही अपराध व बाबाडम का जन्म होता है। चमत्कार के लिए हमारे मन में बहुत महत्व है। राजकुमार हीरानी की फिल्म ‘पी.के.’ में पाखंड को खूब प्रशंसनीय ढंग से प्रस्तुत किया गया है। राम गोपाल वर्मा ने राजपाल यादव को अपनी फिल्म ‘जंगल’ में एक छोटी सी भूमिका निभाने का अवसर दिया। उस समय हास्य अभिनय के क्षेत्र में बियाबां पसरा था। धीरे-धीरे उसे अनेक भूमिकाएं मिलने लगीं। धन आने पर उसे लगा कि यह उसके गुरु की कृपा है। उसने अपने धन के साथ ही ऊंची ब्याज दर पर बड़ी रकम उधार लेकर अपने गुरु का आश्रम बनवाया। दूसरी ओर अन्य हास्य कलाकारों के आने के कारण राजपाल यादव को कम काम मिलने लगा। सूद के कारण कर्ज की राशि बढ़ती गई। इन सब कारणों से हास्य कलाकार राजपाल यादव का जीवन त्रासद हो गया। यह संभव है कि उसने अपने गुरु से भी कुछ धन मांगा हो परंतु इस तरह के गुरु के यहां धन केवल लिया जाता है। राजपाल यादव ने फिल्म निर्माण भी किया परंतु उनके कर्ज बढ़ते ही चले गए। अब जेल में वे अपने को अभागा मानने लग सकते हैं। तर्क सम्मत रास्ता उन्होंने कभी खोजा ही नहीं। मूर्खता के परिणाम को प्राय: भाग्य से जोड़ा जाता है।

बाबा लोग भी तर्कहीनता के शिकार होते हैं। प्राय: बाबाडम में गांजे-चरस का सेवन किया जाता है। जाने कैसे भांग के सेवन को होली के त्योहार से जोड़ दिया गया है। एक प्रांत के ‘भक्त’ मुख्यमंत्री ने बाबाओं को राज्यमंत्री का दर्जा और सुविधाएं दी हैं। कुछ ने यह प्रस्ताव अस्वीकार कर दिया क्योंकि उनके आश्रम में मंत्री निवास से अधिक सुविधाएं हैं। कभी-कभी इस तरह के लोग अपने स्वांग पर इतना यकीन करने लगते हैं कि इसी तरह के एक बाबा ने जल की सतह पर पैदल चलने की घोषणा कर दी थी। मीडिया ने इस प्रसंग को खूब हवा दी परंतु अपने द्वारा रचे नशे में गाफिल बाबा जल पर पैर रखते ही डुबकी खा गया और तमाशा टांय टांय फिस हो गया।

आसाराम प्रकरण में मुकदमा कायम करने वाली कन्या और उसकी मां पर दबाव बनाए गए परंतु उन्होंने मुकदमा वापस नहीं लिया। इन महिलाओं का सम्मान किया जाना चाहिए। तीन चश्मदीद गवाह की मृत्यु भी संदिग्ध हालात में हुई थी। जेसिका प्रकरण पर तो रानी मुखर्जी अभिनीत फिल्म ‘नो वन किल्ड जेसिका’ प्रभावोत्पादक थी। ‘पिंक’ भी असाधारण फिल्म थी। राम रहीम ने भी कुछ फिल्में बनाई हैं। आसाराम पर फैसला आने के बाद कई क्षेत्रों में खुशी मनाई गई, जिसका कारण न्याय की जीत नहीं था। बाबा के आश्रम में असीमित धन चढ़ावे के रूप में आता था, जिसे वे कर्ज के रूप में व्यापारियों को देते थे। अब वे लोग खुश हैं कि उन्हें कर्ज अदाएगी से मुक्ति मिल गई। अजब-गजब भारत में चक्र के भीतर इतने चक्र हैं कि आप कोई थाह नहीं पा सकते।

जयप्रकाश चौकसे

फिल्म समीक्षक

jpchoukse@dbcorp.in

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