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पंज प्यारों की अगुवाई में निकला नगर कीर्तन, जगह-जगह लंगर

श्रीगुरु गोबिंद सिंह जी के प्रकाश पर्व के अवसर पर समस्त गांववासियों के सहयोग से ओढ़ां के गुरुद्वारा श्री सिंहसभा...

Dainik Bhaskar

Jan 06, 2018, 02:15 AM IST
श्रीगुरु गोबिंद सिंह जी के प्रकाश पर्व के अवसर पर समस्त गांववासियों के सहयोग से ओढ़ां के गुरुद्वारा श्री सिंहसभा में रखे गए श्री अखंड पाठ का भोग डाला और लंगर लगाया गया। कस्बे में नगर कीर्तन निकाला गया जिसमें पालकी साहिब के आगे पंज प्यारे चल रहे थे।

नगर कीर्तन श्री गुरुद्वारा साहिब से चलकर नेशनल हाइवे, जलालआना रोड, फिरनी, मलकाना मोहल्ला, घुक्कांवाली रोड, आरा रोड, ग्रीन मार्केट, ख्योवाली रोड, कालांवाली रोड, नवोदय रोड और पुरानी मंडी से होकर जलघर रोड के रास्ते वापिस श्री गुरुद्वारा साहिब पहुंचा। नगर कीर्तन में शामिल श्रद्धालुओं के लिए हर गली मोहल्ले में श्रद्धालुओं ने चाय, बिस्किट, जलेबी, ब्रेड पकोड़ों दूध और चाय आदि के लंगर लगाए।

नगर कीर्तन के दौरान बाबा दीप सिंह गतका पार्टी सुनाम की ओर से रमनदीप सिंह के निर्देशन में गतका प्रसिद्ध जौहर प्रदर्शित किए और कवीशरी जत्था अवतार सिंह शेखपुरा द्वारा कवीशरी सुनाकर संगतों को निहाल किया तथा कीर्तन जत्था जीत सिंह रघुआना ने शब्द कीर्तन द्वारा संगतों में भक्तिभाव का संचार किया। इस दौरान उन्होंने श्री गुरु गोबिंद सिंह जी के जीवन पर प्रकाश डालते हुए बताया कि उनका जन्म पौष सुदी सातवीं सन 1666 को पटना में माता गुजरी और पिता श्री गुरु तेग बहादुर जी के घर हुआ तथा उनका नाम गोबिंद राय रखा गया। सन 1699 की बैसाखी पर गुरु जी पांच प्यारों को अमृत छकाकर गोबिंद राय से गोबिंद सिंह बन गए। कश्मीरी पंडितों की फरियाद पर दिल्ली के चांदनी चौक पर श्री गुरु तेग बहादुर जी ने बलिदान दिया जिसके बाद 11 नवंबर 1675 को गुरु जी गद्दी पर बिराजमान हुए। गुरु जी ने धर्म एवं समाज की रक्षा हेतु 1699 में खालसा पंथ की स्थापना करते हुए पांच प्यारे बनाए और स्वयं उनके शिष्य बनकर बोले जहां पांच सिख इकट्ठे होंगे वहीं मैं निवास करूंगा। गुरु जी ने धर्म, संस्कृति और देश की आन के लिए अपना पूरा परिवार कुर्बान करके नांदेड़ के हजूर साहिब में गुरुग्रंथ साहिब को गुरु का दर्जा देकर कहा कि आज्ञा भई अकाल की तभी चलायो पंथ, सब सिक्खन को हुक्म है गुरु मान्यो ग्रंथ। श्री गुरु गोबिंद सिंह जी ने 42 वर्ष तक जुल्म का डटकर मुकाबला करते हुए सन 1708 को नांदेड़ में सचखंड गमन किया।

ओढ़ां़। गुरुद्वारा साहिब से निकले नगर कीर्तन की अगुवाई करते पंज प्यारे।

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