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रिसर्च में खुलासा, कलेसर जंगल में हाथी तेंदुआ के अलावा टाइगर आने के भी सबूत

कलेसर नेशनल पार्क में वाइल्ड लाइफ इंडियन इंस्टीट्यूट देहरादून के रिसर्च स्टूडेंट्स मिट्टी की जांच कर जंगल की...

Bhaskar News Network | Last Modified - Feb 09, 2018, 02:50 AM IST

कलेसर नेशनल पार्क में वाइल्ड लाइफ इंडियन इंस्टीट्यूट देहरादून के रिसर्च स्टूडेंट्स मिट्टी की जांच कर जंगल की सेहत का पता लगाने में जुटे हैं। ये स्टूडेंट्स जीपीएस के जरिए नेशनल पार्क में जंगली जानवरों की उपस्थिति के आंकड़े भी जुटाएंगे। जांच के दौरान अभी तक जंगल में बड़े जानवरों में हाथी व काफी संख्या में तेंदुए होने के सबूत मिले हैं।

जंगल एरिया से मिट्टी, पत्ते, भूमि की नमी व अन्य कई तरह की जांच के लिए सैंपल लेकर देहरादून जांच के लिए भेजे जा रहे हैं। कलेसर नेशनल पार्क की मिट्टी किस वनस्पति के लिए उपयुक्त है तथा जंगल का हैबिटेट किस प्रजाति के जानवरों के लिए उपयुक्त है इस का पता लगाने के लिए रिसर्च विद्यार्थियों की टीम जुटी है। साक्षी, प्रीती व दिव्या कलेसर वाइल्ड लाइफ कैम्पस में पहुंच कर रिसर्च में लगी हैं। साक्षी ने बताया कि दिन के समय सुबह आठ से लेकर शाम लगभग पांच बजे तक जंगल के विभिन्न हिस्सों से सैंपल लिए जा रहे हैं। यंत्रों के जरिए भूमि की नमी की जांच की जाती है। रिकार्ड तैयार किया जा रहा है। जमीन की उर्वरा शक्ति परखने के लिए मिट्टी के सैंपल लिए जा रहे हैं जो जांच के लिए देहरादून स्थित इंस्टीट्यूट में भेजे जा रहे हैं। विभिन्न प्रजाति के पेड़ पौधों के पत्तों के सैम्पल भी जांच के लिए भेज रहे हैं।

वहीं इस बारे में वन्य प्राणी विभाग के जिला इंस्पेक्टर राज पाल सिंह ने बताया कि जंगल की मिट्टी की जांच के लिए सैंपल देहरादून भेजे जा रहे हैं। जीपीएस के माध्यम से जंगल के क्षेत्र में जंगली जानवरों की उपस्थिति का भी पता चल पाएगा। उन्होंने बताया कि किस क्षेत्र में जानवरों की कितनी संख्या है ये भी जांच की जा रही है। रिसर्च का कार्य करीब एक साल तक चलेगा।

खिजराबाद | कलेसर नेशनल पार्क में स्टूडेंट्स जांच करते हुए।

हाथी व लैपर्ड के मिले पुख्ता सबूत

रिसर्च में जुटे स्टूडेंट्स ने बताया कि जंगल में जांच के दौरान नर हाथी देखा गया है। इसी प्रकार लैपर्ड के पगमार्क, जंगली बकरे व हाथी की मल जंगल से मिला है। स्टूडेंट्स की जांच से सामने आया है कि लगभग दस साल पूर्व कलेसर जंगल में टाइगर भी आते जाते रहे हैं, लेकिन जंगल का क्षेत्रफल जानवरों की चहल कदमी के लिए कम होने के कारण वह अधिक समय यहां पर नहीं ठहर पाते।

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