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एनएच 152 डी : मुआवजा बढ़ाने को लेकर दूसरे दिन भी धरने पर रहे किसान

2 वर्ष पहले
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गंगहेड़ी से नारनौल तक बनने वाले नेशनल हाइवे 152 डी ग्रीन कॉरिडोर निर्माण से पहले ही बवाल खड़ा हो गया है। भारतमाला प्रोजेक्ट के तहत बनाए जाने वाले इस नेशनल हाइवे के विरोध में गांव गंगहेड़ी, कंथला, तलहेड़ी, मलिकपुर, चनालहेड़ी, मुर्तजापुर, चंडीगढ़ फार्म, सारसा, संधौला, रुआं व सैंसा सहित कई गांवों के किसानों को धरना लगातार दूसरे दिन भी जारी रहा। गांव बिलोचपुरा के सामने किसानों ने सरकार के खिलाफ नारेबाजी की।

जबरदस्ती नहीं देंगे सड़क बनाने: कहा कि जब तक अधिग्रहित की गई भूमि का मुआवजा दो करोड़ रुपए प्रति एकड़ उन्हें नहीं दिया जाता। वे धरना जारी रखेंगे। किसी भी कीमत पर सरकार को यहां जबरदस्ती सड़क नहीं बनाने देंगे। यदि सरकार ने जबरदस्ती की तो मशीनें उनके ऊपर से गुजरेंगी।

आरोप: नियमों को रखा ताक पर: अन्नदाता किसान यूनियन के राष्ट्रीय सचिव सुखदेव सिंह विर्क, मुकेश धवन, हरमोहिंद्र सिंह ढिल्लों, साहब सिंह सारसा, अजीत सिंह तलहेड़ी, सुखदेव सिंह, रामफल व गहल सिंह संधू ने बताया कि जमीन अधिग्रहण करते समय नियमों को ताक पर रखा गया। 16 नवंबर 2018 को अधिकारियों ने अपने स्तर पर जमीन एक्वायर करने की प्रक्रिया पूरी कर ली। इससे पहले कोई नोटिस किसानों को नहीं दिया गया। सारा काम पूरा करने के लगभग 34 दिन बाद 20 दिसंबर 2018 को उन्हें अधिकारियों ने बातचीत के लिए बुलाया। जिस पर किसानों ने उसी समय जवाब दे दिया था कि जब 35 दिन पहले सारा काम हो चुका है तो अब उन्हें बुलाने का क्या मतलब है। किसानों में तभी से नाराजगी थी। उसके बाद 51 से लेकर 52 लाख रुपए प्रति एकड़ मुआवजा किसानों को दे दिया गया। जबकि कैथल और चरखी दादरी जैसी रेतीली जमीनों के बदले जब किसानों ने धरना दिया तो उन्हें एक करोड़ 10 लाख के करीब मुआवजा दिया गया। किसानों का कहना है कि हमारी जमीन सबसे ज्यादा उपजाऊ है। फिर भी हमें कम मुआवजा क्यों दिया जा रहा है।

सर्टिफिकेट देते समय काम लटकाने का आरोप : भारतीय किसान मजदूर संयुक्त यूनियन के प्रदेश प्रभारी सुखदेव सिंह ने बताया कि पूरे देश में कानून है कि यदि किसी किसान की जमीन का अधिग्रहण सरकार करती है तो उसे दूसरी जगह जमीन खरीदने पर रजिस्ट्री खर्च नहीं देना पड़ता। इसके लिए उसे राजस्व विभाग से एक सर्टिफिकेट लेना पड़ता है। जिसे दिखाकर वह अपनी दोबारा खरीदी गई जमीन की रजिस्ट्री फीस माफ करवा सकता है, लेकिन इस जमीन के अधिग्रहण के बाद उन्हें सर्टिफिकेट नहीं दिया गया। इसके चलते दूसरी जगह जमीन खरीदने वाले किसानों को रजिस्ट्री फीस भरकर जमीन नाम करवानी पड़ी।

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