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जीरो बजट खेती से प्रति एकड़ 32 क्विंटल तक लिया धान का उत्पादन, लागत आधी से भी कम

अंधी होड़ में भारी मात्रा में इस्तेमाल हो रहे पेस्टिसाइड और खाद से स्वास्थ्य को बड़ा नुकसान हो रहा है।

Bhaskar news | Last Modified - Jan 22, 2018, 07:13 AM IST

जीरो बजट खेती से प्रति एकड़ 32 क्विंटल तक लिया धान का उत्पादन, लागत आधी से भी कम

पानीपत/भिवानी.कृषि प्रधान राज्य हरियाणा में ज्यादा उपज लेने की अंधी होड़ में भारी मात्रा में इस्तेमाल हो रहे पेस्टिसाइड और खाद से स्वास्थ्य को बड़ा नुकसान हो रहा है। कैंसर, बीपी, स्किन एलर्जी समेत संतानोत्पत्ति की क्षमता भी कम हो रही है। जरूरत से ज्यादा केमिकल के इस्तेमाल से करीब 5.5 लाख एकड़ जमीन बंजर हो चुकी है। ऐसे में एचएयू के साइंटिस्ट और हिमाचल प्रदेश के राज्यपाल आचार्य देवव्रत ने प्राकृतिक खेती पर जोर देना शुरू किया। इसमेें गाय के गोबर, गोमूत्र, गुड़ और बेसन के माध्यम से बनी खाद का इस्तेमाल शुरू किया गया।

पिछले पांच सालों से चल रहे इस प्रयोग ने इस बार बड़ी सफलता हासिल की। 180 एकड़ जमीन पर उगाए गए मोटे धान की उपज करीब 32 क्विंटल प्रति एकड़ तक रही। यह किसी भी खेत में भारी मात्रा में इस्तेमाल की गई खाद और पेस्टिसाइड की उपज के बराबर है। कहीं कहीं तो खाद के इस्तेमाल से उत्पादन कम भी हो रहा है, और जमीन खराब हो रही है। एचएयू के वैज्ञानिक डॉ. वजीर सिंह इस पूरे प्रोजेक्ट में लगे हैं। दक्षिण भारत से शुरू हुआ यह प्रयोग अब हरियाणा में तेजी से आगे बढ़ रहा है।

इस प्रोजेक्ट में देश की नॉन एग्रीकल्चर यनिवर्सिटी एमडीयू भी शामिल हो गई है। इसके विद्यार्थी गांवों में किसानों को जागरूक करेंगे। डॉ. वजीर सिंह बताते हैं कि इस खेती से ही किसान की आय दोगुनी हो सकती है। क्याेंकि इसमें केवल बीज और पानी का खर्च आता है। खाद और पेस्टिसाइड नहीं चाहिए।

भि वानी की गोशाला में प्राकृतिक खेती के लिए तैयार हो रही घनजीवामृत खाद से प्रदेश के 11 सौ किसान जीरो बजट खेती शुरू करेंगे। प्राकृतिक खेती के जागरूकता अभियान में जुड़े संपूर्ण सिंह बताते हैं कि रोहतक, भिवानी और झज्जर के किसान इसके लिए अपनी कुल जमीन का एक एकड़ हिस्सा इस्तेमाल करेंगे। इनकी फसल उत्पादन में अगर कोई हानि होती है तो हमारा संगठन बाजार की कीमत से डेढ़ गुना कीमत पर किसानों की फसल खरीदेगा। इसके शुभारंभ के लिए रोहतक की एमडी यूनिवर्सिटी में 11 सौ किसानों को 17 फरवरी को नि:शुल्क यह खाद वितरित की जाएगी। हिमाचल के राज्यपाल आचार्य देवव्रत व सुभाष पालेकर से प्रेरणा लेकर महर्षि दयानंद विश्वविद्यालय के उपकुलपति प्रो. बिजेंद्र कुमार पूनिया तथा छात्रों ने जीरो बजट खेती को जन-जन तक पहुंचाने के लिए अभियान छेड़ा है। पहली बार किसी गैर कृषि विश्वविद्यालय द्वारा एक किसान एक जवान प्रोजेक्ट शुरू किया गया है। इस प्रोजेक्ट को सफल बनाने के लिए तीन प्रशासनिक कमेटियां भी गठित की गई हैं।

यह है घनजीवामृत

घनजीवामृत के लिए देसी गायों का 100 किलोग्राम गोबर, एक किलोग्राम गुड़, दो किलोग्राम बेसन तथा खेत की मिट्टी की जरूरत पड़ती है और गाय का मूत्र दो लीटर इस्तेमाल होता है। इस मिश्रण को दो से चार दिन तक छाया में सुखाया जाता है। तैयार घनजीवामृत छह माह तक इस्तेमाल किया जा सकता है। इसमें नाईट्रोजन की भरपूर मात्रा होती है।

जीरो बजट खेती से ही दोगुनी होगी किसानों की आय

भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद के वैज्ञानिकों ने भी इस विधि को लाभदायक बताया है। जीरो बजट प्राकृतिक खेती किसानों के लिए वरदान है क्योंकि इसमें किसान को कुछ भी खर्च नहीं करना पड़ेगा। इस संबंध में कृषि अनुसंधानकर्ता डॉ.वजीर सिंह बताते हैं कि किसानों की आय इसी के माध्यम से दोगुनी हो सकती है।

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Web Title: jiro bjt kheti se prti ekड़ 32 kvintl tak liyaa dhaan ka utpaadn, laagat aadhi se bhi km
(News in Hindi from Dainik Bhaskar)

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