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जन्म से टांगें नहीं, खेलों को साथी बनाया तो शूटिंग में जीत लिए 4 मेडल

आम आदमी की तरह चल-फिर नहीं पाते हैं, पर उनके जैसा कारनामा कर पाना आम आदमी के लिए आसान नहीं है।

सुभाष राय | Last Modified - Feb 12, 2018, 02:05 AM IST

  • जन्म से टांगें नहीं,  खेलों को साथी बनाया तो शूटिंग में जीत लिए 4 मेडल
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    26 साल के इशांक की जन्म से ही दोनों टांगे नहीं हैं।

    पानीपत.ये कहानी है 26 साल के इशांक की। इनकी जन्म से ही दोनों टांगे नहीं हैं। भले ही वह आम आदमी की तरह चल-फिर नहीं पाते हैं, पर उनके जैसा कारनामा कर पाना आम आदमी के लिए आसान नहीं है। पानीपत के खैल बाजार में रहने वाले इशांक ने दिव्यांगता के विरुद्ध शारीरिक और मानसिक लड़ाई खुद लड़ी। दोस्त से लेकर रिश्तेदार तक के तानों ने अंदर से मजबूत बनाया। दिव्यांगों के संघर्ष की कहानियां पढ़कर हासिल किया मुकाम...

    - चार साल पहले वे इतना बीमार हुए कि 7 माह बिस्तर पर रहना पड़ा। इसी दौरान इशांक ने दिव्यांगों के संघर्ष की कहानियां सर्च कीं। पता चला कि वह खेल ही है, जिससे दिव्यांगता को मात दी जा सकती है।

    - 2014 से खेलना शुरू किया। नियमित प्रैक्टिस और कठिन मेहनत की बदौलत कई खेलों को साध लिया।

    - 10 मीटर राइफल शूटिंग में अब तक राष्ट्रीय स्तर के 4 मेडल जीत चुके हैं। हरियाणा व्हीलचेयर बास्केटबॉल टीम को भी लीड कर रहे हैं। रग्बी भी खेलते हैं।


    पढ़िये उनके संघर्ष और जज्बे की कहानी...

    - इशांक ने बताया कि दोस्त-रिश्तेदार सब छिप-छिप कर कहते थे- उससे कुछ नहीं होगा, दूसरों पर बोझ बनकर रहेगा, इस फीलिंग ने और ताकत दी, अब पैरालिंपिक में मेडल जीतने को ही बनाया लक्ष्य

    जब से समझ आई है, यही सुन रहा था कि भगवान ने ऐसा बनाया कि जिंदगीभर दूसरों पर बोझ बनकर रहेगा। इसी फीलिंग ने मुझे अंदर से मजबूत बना दिया।

    - सच कहूं तो 22 साल तक ही मैंने दिव्यांगता झेली है। साल 2013 में मुझे टाइफाइड बुखार हो गया। 7 महीने बिस्तर पर रहा। तब इंटरनेट पर सर्च करने लगा कि दुनिया के दिव्यांग में स्वस्थ रहने के लिए क्या-क्या करते हैं। उनकी सफलताओं की ढेरे सारी कहानियां पढ़ीं।

    - पता चला कि खेल ही है जिसमें दिव्यांगों ने शोहरत हासिल की। वे पांच-पांच गेम खेलते हैं। यहीं से नई राह पर निकल पड़ा। खेलने का फैसला लिया तो मां कहने लगी कि खेलो लेकिन ऐसा कि चोट न लगे। दादाजी और नानाजी ने भी सपोर्ट किया। मैं द्रोणाचार्य शूटिंग स्पोर्ट्स एकेडमी पहुंचा। ट्राइसाइकिल से वहां पहुंचते-पहुंचते पसीने से तर-बतर हो जाता।

    - मेरी मेहनत को देख कोच ने स्कूटी दी तो हिम्मत बढ़ गई। खर्चा निकालने के लिए प्रैक्टिस के बाद सनौली रोड पर पिताजी की डेयरी की दुकान पर काम करता हूं। मेरी भी पांच गेम खेलने की इच्छा है। फिलहाल व्हीलचेयर शूटिंग, रग्बी और बॉस्केटबॉल खेल रहा हूं। चौथे गेम के रूप में तैराकी सीख रहा हूं। पांचवें गेम का चुनाव बाद में करूंगा। पैरालिंपिक में मेडल जीतना ही मेरा लक्ष्य है।

    ऐसा दर्द झेला : शूटिंग जैकेट न होने पर प्रतियोगिता से बाहर हुए

    - इशांक हर शनिवार को अकेले बस से दिल्ली जाते हैं। वहां मेट्रो में सफर कर कैलाश कॉलोनी में रग्बी की प्रैक्टिस करते हैं।

    - 20 जनवरी 2018 को हरियाणा रोडवेज के कंडक्टर ने महज इसलिए बस से उतार दिया, क्योंकि उनके पास व्हीलचेयर थी।

    - 2016 में शूटिंग जैकेट न होने पर प्रतियोगिता से बाहर कर दिया गया। बास्केटबॉल टीम का कैप्टन होने के बावजूद इशांक के पास ओरिजनल व्हीलचेयर नहीं है।

    उपलब्धियां

    -दिसंबर 2014 में दिल्ली में बास्केटबॉल वर्कशाॅप में भाग लिया। आज हरियाणा व्हीलचेयर बास्केटबॉल टीम के कप्तान हैं।
    -10 मीटर राइफल शूटिंग में 2017 में ऑल इंडिया मावलंकर चैंपियनशिप के स्टैंडिंग वर्ग में गोल्ड मेडल जीता।

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    0 मीटर राइफल शूटिंग में अब तक राष्ट्रीय स्तर के 4 मेडल जीत चुके हैं। हरियाणा व्हीलचेयर बास्केटबॉल टीम को भी लीड कर रहे हैं। रग्बी भी खेलते हैं।
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    चार साल पहले वे इतना बीमार हुए कि 7 माह बिस्तर पर रहना पड़ा।
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    - 20 जनवरी 2018 को हरियाणा रोडवेज के कंडक्टर ने महज इसलिए बस से उतार दिया, क्योंकि उनके पास व्हीलचेयर थी।
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    2016 में शूटिंग जैकेट न होने पर प्रतियोगिता से बाहर कर दिया गया। बास्केटबॉल टीम का कैप्टन होने के बावजूद इशांक के पास ओरिजनल व्हीलचेयर नहीं है।
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    दिसंबर 2014 में दिल्ली में बास्केटबॉल वर्कशाॅप में भाग लिया। आज हरियाणा व्हीलचेयर बास्केटबॉल टीम के कप्तान हैं।
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    0 मीटर राइफल शूटिंग में 2017 में ऑल इंडिया मावलंकर चैंपियनशिप के स्टैंडिंग वर्ग में गोल्ड मेडल जीता।
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