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हर कनेक्शन पर देने थे 10 एलईडी बल्ब, 60 लाख को बांटे सिर्फ 1.38 करोड़

एलईडी बल्व, ट्यूबलाइट और स्टार रेटेड पंखों की वजह से पिछले डेढ़ साल में करीब 200 मेगावाट बिजली की डिमांड कम हुई है।

Dainik Bhaskar

Dec 04, 2017, 04:48 AM IST
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चंडीगढ़/पानीपत. हरियाणा में एलईडी बल्व, ट्यूबलाइट और स्टार रेटेड पंखों की वजह से पिछले डेढ़ साल में करीब 200 मेगावाट बिजली की डिमांड कम हुई है। इसमें सर्वाधिक 194.12 मेगावाट बिजली की बचत तो केवल एलईडी बल्व के उपयोग से ही कम हुई है। बिजली की डिमांड और सप्लाई मेंटेन करने में कंपनियों को तो सहूलियत हुई ही है। लेकिन उपभोक्ताओं को भी उनके बिलों में 207 करोड़ रुपए की बचत हुई है। यह दावा बिजली महकमे ने किया है। लेकिन इन सब के बावजूद अभी भी उपभोक्ताओं को पूरी बिजली नहीं मिल पा रही है। 24 घंटे सप्लाई का दावा करने वाली सरकर शहरों में 18 से 20 घंटे बिजली दे पा रही है, गांवों में तो यह सप्लाई 8 से 12 घंटे तक ही है।


उधर, बिजली महकमा एलईडी बल्ब के माध्यम से यह दावा कर रहा है कि इस सुविधा से पर्यावरण को भी फायदा हुआ है। क्योंकि अगर थर्मल पावर प्लांटों में कोयला जलाकर यही 200 मेगावाट बिजली पैदा की जाती तो कंपनियों के मुताबिक करीब 2.90 लाख टन से ज्यादा कार्बन डाइऑक्साइड गैस वातावरण में घुलती, जो मानव स्वास्थ्य के साथ-साथ अन्य चीजों पर भी प्रतिकूल प्रभाव डालती। बिजली बचाने के उद्देश्य से एलईडी बल्व, ट्यूबलाइट और स्टार रेटेड उपकरणों का उपयोग बढ़ाने के लिए यूं तो देश व्यापी प्रयास किए जा रहे हैं। इस कड़ी में हरियाणामें भी रियायती दरों पर एलईडी बल्व बांटे जा रहे हैं। इस योजना के तहत एक कनेक्शनधारी को 10 एलईडी बल्ब बांटने थे।

हरियाणा में भी बिजली कंपनियों ने पिछले साल अप्रैल से उपभोक्ताओं को एलईडी बल्व, ट्यूबलाइट और पंखों का वितरण शुरू किया गया था। तब से अब तक प्रदेश में 1 करोड़ 38 लाख 65 हजार 796 एलईडी बल्व, 1 लाख 59 हजार 265 ट्यूबलाइट और 44 हजार 477 पंखों का वितरण किया जा चुका है। बिजली कंपनियों के मुताबिक हरियाणा में कुल 60 लाख 70 हजार बिजली कनेक्शन हैं। इनमें सर्वाधिक 47 लाख कनेक्शन घरेलू हैं। जबकि 1.02 लाख इंडस्ट्रियल, 6.26 लाख कृषि कनेक्शन और 6.90 लाख कामर्शियल बिजली कनेक्शन हैं।

सरकारी विभाग ही नहीं हैं बिजली बचत के प्रति सचेत

यूं तो बिजली बचाने के लिए एलईडी बल्व, ट्यूबलाइट और स्टार रेटेड उपकरण वितरण के साथ ही राज्यभर में जागरूकता अभियान चलाए जा रहे हैं। सरकारी विभागों, बोर्ड, कॉरपोरेशन आदि कार्यालयों में भी कई जगहों पर बिना जरूरत के पंखे, ट्यूबलाइट, एसी, पंखा बंद करने के निर्देश चस्पा हो रखे हैं। लेकिन हालात इसके एकदम उलट हैं। हरियाणा सिविल सचिवालय को ही लें तो चौथे फ्लोर से लेकर आठवें फ्लोर तक कई मंत्रियों, अफसरों और सलाहकारों के कमरे मिल जाएंगे, जिनमें बिना जरूरत के एसी, पंखे और ट्यूब लाइट चलते रहते हैं। यही हाल कमोबेश मंत्रियों, विधायकों और अफसरों की कोठियों का है।

ट्यूबलाइट और पंखे वितरण में जींद-झज्जर सर्किल पिछड़े

उपभोक्ताओं को एलईडी ट्यूबलाइट और स्टार रेटेड पंखे वितरण में जींद और झज्जर सर्किल सबसे फिसड्डी हैं। फऱीदाबाद, गुड़गांव, अंबाला-पंचकूला और हिसार सर्किल की स्थिति अच्छी है। दक्षिण हरियाणा में 1,10,717 एलईडी ट्यूबलाइट और 27,949 पंखे वितरित किए गए हैं। जबकि उत्तर हरियाणा में 48,548 ट्यूबलाइट और 16,258 पंखे वितरित हुए हैं। इनमें झज्जर सर्किल में केवल 286 ट्यूबलाइट और 598 पंखों का वितरण हुआ है। इसी तरह जींद सर्किल में भी केवल 299 में ट्यूबलाइट और इतने ही पंखे वितरित किए जा सके हैं। फरीदाबाद सर्किल में 33,240 ट्यूबलाइट, 3002 पंखे, गुड़गांव सर्किल में 29,448 ट्यूबलाइट, 4874 पंखे, अंबाला-पंचकूला सर्किल में 26793 ट्यूबलाइट, 6,124 पंखे और हिसार में 19899 ट्यूबलाइट एवं 6058 पंखों का वितरण किया जा चुका है।

9 वाट के बल्ब और 20 वाट की ट्यूबलाइट दी

अभी तक राज्य में 23 वाट के बल्व, 40 वाट की ट्यूबलाइट और 75 वाट की क्षमता वाले पंखों का उपयोग हो रहा था। इनमें ज्यादातर लोग सीएफएल उपयोग कर रहे थे। अब उन्हें 9 वाट के बल्व, 20 वाट की ट्यूबलाइट और 50 वाट के पंखे उपलब्ध कराए गए हैं। इस तरह 14 से 25 वाट तक बिजली की बचत हुई है। एक दिन में औसतन 6 घंटे बल्व औऱ ट्यूब लाइट जलते हैं तो करीब 13 घंटे तक पंखा चलता है। अगर इस अवधि को पूरे साल में बदला जाए तो 300 दिन बल्व, ट्यूबलाइट जलते हैं, वही 240 दिन पंखे का उपयोग होता है।

पीक डिमांड मैनेज करने में मिली मददः दास

एलईडी बल्ब, ट्यूबलाइट और स्टार रेटेड उपकरणों के उपयोग का न केवल कंपनियों बल्कि उपभोक्ताओं को भी फायदा है। उनका बिल तो कम होता ही है, साथ ही बिजली कंपनियों को भी पीक डिमांड मैनेज करने में मदद मिल रही है। इससे ज्यादा उपभोक्ताओं को बिना बाधा के ज्यादा समय बिजली मिल पाती है। इसका पर्यावरण सुधार में भी फायदा मिलता है, क्योंकि थर्मल पावर प्लांट में कोयला जलाकर बिजली पैदा करने से वातावरण प्रदूषित तो होता ही है।
-पी. के. दास, अतिरिक्त मुख्य सचिव ऊर्जा विभाग, हरियाणा

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