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ई-वे बिल से बचने को रेहड़ी-रिक्शा पर लौटे व्यापारी, 40-45 हजार तक के बना रहे बिल

तीन में से दो ही रिटर्न हो रही फाइल, रिफंड में भी आ रही परेशानी

Dainik Bhaskar

Jul 01, 2018, 06:12 AM IST
पानीपत में रिक्शा से की जा रही पानीपत में रिक्शा से की जा रही

पानीपत. देशभर में जीएसटी को शुरू हुए एक साल का समय पूरा हो गया है। एक साल में जीएसटी का सफर देखें तो शुरुआत से लेकर अब तक काफी सुधार किए गए, लेकिन अभी कई दिक्कतें आ रही हैं। इन पर काम करना बाकी है। जीएसटी में टैक्स चोरी का विकल्प न बचे, सरकार ने ई- वे बिल शुरू किया। इसे लागू करने का उद्देश्य 50 हजार से ज्यादा के सामान के लेन-देन पर ई-वे बिल जनरेट करना था, जिससे पता लग सके कि कौन व्यापारी किस से कितने का सामान खरीद रहा है और किसको कितने में बेच रहा है, लेकिन व्यापारियों ने इसका तोड़ निकाल लिया है।

जिन जगहों पर ट्रांसपोर्ट से भेज रहे सामान, वहां नहीं मिल रहा फार्म बी: व्यापारी ई-वे बिल से बचने के लिए बड़े माल टुकड़ों में बिलिंग कर रहे हैं। यानी वो लाखों रुपए का बिल एक साथ बनाने के बजाय 40 से 45 हजार के अलग-अलग कई बिल बना रहे हैं। एक जगह से दूसरी जगह सामान ले जाने के लिए मोटर गाड़ी की जगह घोड़ा गाड़ी और रिक्शा आदि का प्रयोग किया जा रहा है। शहरों में सुबह शाम के समय ऐसा लगता है कि घोड़ा गाड़ी का पुराना समय लौट आया हो। वहीं कारोबारी 7 से 8 अलग-अलग ट्रांसपोर्ट पर अपना माल बुक करवाकर ई-वे बिल से बच रहे हैं। राज्य कर विभाग अभी यह तय नहीं कर पा रहा है कि इस तरह के मामलों में कैसे कार्रवाई करें। यह घोड़ा गाड़ी व रिक्शा पानीपत समेत कई शहरों में सामने आ रही है।

टैक्स से बचने के लिए घोड़ा गाड़ी का प्रयोग: ई-वे बिल से बचने के लिए व्यापारी सोच समझ कर घोड़ा गाड़ी का प्रयोग कर रहे हैं। दरअसल मोटर वाहन से ट्रांसपोर्ट करने पर ही इसे जनरेट करना अनिवार्य है। ऐसे में ज्यादातर व्यापारी जिले के अंदर ही बेचे जाने वाले 50 हजार से ज्यादा के सामान को रिक्शा या रेहड़ियों आदि के माध्यम से भेज रहे हैं। जिनकी न तो कोई जांच होती है और न ही कोई ई वे बिल जनरेट करना पड़ रहा है। इतना ही नहीं एक साथ कई घोड़ा गाड़ी या रिक्शा देख कोई चेकिंग न कर ले इसलिए अलग-अलग रास्तों का प्रयोग किया जाता है।
व्यापारियों को रिटर्न और रिफंड में आ रही परेशानी: सीए गौरव गुप्ता ने बताया कि जीएसटी को भले ही एक साल पूरा हो गया है, लेकिन इसमें कुछ सुधार अभी करने की जरूरत है। इतना समय होने के बावजूद व्यापारियों को रिटर्न फाइल करने से लेकर रिफंड लेने में काफी दिक्कतें आ रही हैं। जीएसटी के तहत कुल 3 रिटर्न फाइल करनी होती हैं, लेकिन दो फाइल हो रही हैं। वहीं रिफंड शुरुआत से ही काफी देरी से मिलना शुरू हुआ था। उसके बाद भी दो महीने मिलता है, बाद में कोई दिक्कत आ जाती है। इसलिए कुछ तकनीकी पहलुओं पर अभी काम करने की जरूरत है।
बिल मांगने की आदत बढ़ी, लेकिन फिर भी मिल रही कच्ची पर्ची : जीएसटी के लागू होने से लोगों में सामान खरीदने के बाद उसका बिल लेने की आदत बढ़ी है, लेकिन देखने में आ रहा है कि शहरों में बैठे राशन, बिजली उपकरण और अन्य छोटे सामान वाले दुकानदार दिल्ली से दो नंबर में सामान ला रहे हैं। इसके बाद ग्राहक के बिल मांगने पर उसकी कच्ची पर्ची बनाकर दे देते हैं। ग्राहक उसे बिल समझ ला जाते हैं और दुकानदार टैक्स चोरी कर रहे हैं। पक्की बिल बुक में कुछ सामान की ही एंट्री करते हैं और कुछ टैक्स देकर बड़े की चोरी अभी भी हो रही है। वहीं बड़े व्यापारियों की तरफ से भी खतों में छेड़छाड़ की बातें आ रही हैं। अधिकारियों की जांच में भी सामने आया है कि कुछ व्यापारी कम ज्यादा रिफंड ले रहे हैं।
कागजी कार्रवाई घटी, कम हुए महकमे के चक्कर: जीएसटी लागू होने के बाद एक्सपोर्टर्स में सबसे खुशी इस बात की है कि उनकी कागजी कार्रवाई घट गई है। सब कुछ ऑनलाइन हो रहा है। अपने टैक्स से संबंधित दफ्तरों के चक्कर लगाने से मुक्ति मिल गई है। टैक्स से जुड़े अधिकारियों की अब आवभगत की जरूरत नहीं रही। हालांकि इस बात का मलाल भी है कि सरकार जीएसटी के दायरे में आए कुल जीएसटीएन के करीब 10 प्रतिशत एक्सपोर्टर व इंपोर्टर का ध्यान नहीं रख रही है।
सामान्य हो रही हैं शुरुआती दिक्कतें: जीएसटी आया तो एक्सपोर्टर के लिए भी परेशानी की वजह बन गया था। अब ये दिक्कतें धीरे-धीरे सामान्य होती जा रही हैं। पहले बॉन्ड देकर कारोबार करते थे, अब एलओबी देकर काम कर रहे हैं। जिन लोगों को अभी जीएसटी अच्छे से समझ नहीं आया है, उन्हें दिक्कतें जरूर हो सकती हैं, लेकिन टैक्स का यह सिस्टम पहले के लंबे प्रोसेस के मुकाबले आसान ही है। जीएसटी आने से स्पेशल इकॉनोमिक जोन में टैक्स बेनीफिट का जो प्रोविजन था, वह भी खत्म हो गया है।

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