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अब गिहउहबीरद जलहरल हीाउल अीालहदी

अब गिहउहबीरद जलहरल हीाउल अीालहदी

Danik Bhaskar | Dec 11, 2017, 11:47 AM IST
पहाड़ी क्षेत्र में कई सारी औषधि पहाड़ी क्षेत्र में कई सारी औषधि

पानीपत। आज वर्ल्ड माउंटेन डे है। इसे मनाए के पीछे की वजह जितनी रोचक है, उससे कहीं रोचक अरावली पर्वत के अंतिम छोर पर हरियाणा के नारनौल में स्थित इस पहाड़ी की कहानी है। इसे ढोसी की पहाड़ी के नाम से जाना जाता है। यह वही पुरातन पहाड़ी है, जिस पर कभी च्यवनप्राश की खोज हुई थी। यह कहानी शुरू होती है अरावली पर्वत शृंखला में तपस्या कर रहे च्यवन ऋषि से। एक राजकुमारी ने अनजाने में ऋषि की आंखें फोड़ दी। फिर वही राजकुमारी ताउम्र उनकी संगिनी बनकर रही थी। हरियाणा में इस कहानी पर 'अंधे की दुल्हन' फिल्म भी बन चुकी है, जो बेहद सराही गई। कुछ इस तरह है आगे की कहानी...

- बताते चलें कि जिला महेंद्रगढ़ के मुख्यालय नारनौल नगर से 7 किमी दूर ढोसी पर्वत पर महर्षि च्यवन का आश्रम है। मान्यता है कि यहां महर्षि च्यवन ने सात हजार साल तपस्या की थी।
- महर्षि ने इस क्षेत्र में पाई जाने वाली जड़ी-बूटियों से औषधि तैयार की थी, जिसे आज भी च्यवनप्राश के नाम से जाना जाता है। पहले हरियाणा में प्राइमरी स्कूलों में पढ़ाई जाने वाली किताबों में भी इसका उल्लेख मिलता था और कई अन्य धार्मिक ग्रंथों में भी पढ़ा जा सकता है कि नारनौल के निकट ढोसी की पहाड़ी को महर्षि च्यवन ने अपना तपोस्थल बनाया था।

इस तरह हुआ था वह भयानक हादसा
- इस पहाड़ी की चोटी पर बैठकर वह गहन तपस्या में लीन हो गए। लगातार तप में लीन होने के कारण उनके शरीर पर मिट्टी का आवरण जमा हो गया था।
- एक दिन महान सूर्यवंशी राजा शर्याति अपने परिवार सहित ढोसी पर भ्रमण के लिए आये। उनकी युवा पुत्री राजकुमारी सुकन्या भी उनके साथ थी। सुकन्या उस स्थान पर जा पहुंची, जहां महर्षि च्यवन तपस्यारत थे।
- तपस्या की मुद्रा में बैठे च्यवन ऋषि की मिट्टी से ढकी आकृति में सरकंडे घुसा दिए। ये सरकंडे महर्षि च्यवन की आंखों में घुस गए। मिट्टी की आकृति से खून बहता देखकर राजकुमारी डर गई और उसने अपने पिता राजा शर्याति को वहां बुलाया।
- जब शर्याति ने मिट्टी को वहां से हटाकर देखा तो उन्हें वहां महर्षि च्यवन बैठे दिखाई दिए, जिनकी आंखें राजकुमारी सुकन्या ने अज्ञानतावश फोड़ दी थी।

पछतावे से भर राजकुमारी ने ऋषि से कर ली थी शादी
- सच्चाई जानकर सुकन्या आत्मग्लानि से भर गई। सुकन्या ने वहीं आश्रम में रहकर च्यवन ऋषि की पत्नी बनकर उनकी सेवा कर पश्चाताप करने का निर्णय लिया।
- बताया जाता है कि बाद में देवताओं के वैद्य अश्वनी कुमार ने अपने आशीर्वाद से महर्षि च्यवन को युवा बना दिया। युवावस्था प्राप्त कर महर्षि च्यवन ने उस क्षेत्र को अपने तप के बल पर दिव्य क्षेत्र बना दिया।
- यहीं जड़ी-बूटियों से सदैव शरीर में स्फूर्ति बनाए रखने वाली एक खास किस्म की औषधि उन्होंने तैयार की थी, इसी वजह से इसका नाम च्यवनप्राश पड़ गया।

क्या-क्या है देखने लायक है ढोसी की पहाड़ियों में
- पहाड़ी के कुछ ऊपर चढऩे के बाद शिवकुंड आता है, जहां भगवान शिव का प्राचीन मंदिर है। लगभग 460 सीढ़ियां चढ़ने के बाद पहाड़ी का शिखर आता है। जहां महर्षि च्यवन आश्रम व मंदिर हैं।
- यहीं चन्द्र कूप है जिसके बारे में मान्यता है कि उसमें सोमवती अमावस्या को पानी स्वयमेेव बाहर आता था, ऐसा संभवत ज्वार-भाटे के कारण होता होगा। अब भी यहां सोमवती अमावस्या के दिन भारी मेला लगता है और पवित्र स्नान के लिए दूर-दूर से लोग आते हैं।

एक रोचक कहानी यह भी, कलश चुराने वाले हो गए अंधे
- ग्रामीणों का कहना है कि च्यवन ऋषि आश्रम के ऊपर लगे बेशकीमती स्वर्ण कलश को चोरों ने एक बार चुरा लिया था। जैसे ही वे इस कलश को लेकर गांव की सीमा से निकले, वे अपनी आखों की रोशनी खो बैठे।
- इस कारण वे आगे नही बढ़ सके, लेकिन गांव की तरफ रुख करते ही उन्हें दिखाई देने लगा। वे घबरा गए और उन्होंने कलश को मंदिर में वापस दे दिया।