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इस गांव में पहली बार फहराएगा तिरंगा, ऐसे होगा गुलामी की कहानी का अंत

29 मई 1857 को रोहनात गांव के वीर जांबाजों ने बहादुरशाह के आदेश पर अंग्रेजी हुकूमत की ईंट से ईंट बजा दी।

dainikbhaskar.com | Last Modified - Jan 15, 2018, 10:23 AM IST

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    भिवानी जिले के गांव रोहनात की गुलामी की कहानी कहती नजर आती एक तस्वीर। अंग्रेजी हुकूमत में इस गांव के सैकड़ों लोगों पर अत्याचार हुए थे। आज भी यहां न ताे आजादी दिवस मनाया जाता है और न ही कभी गणतंत्र दिवस ही मनाया गया, लेकिन इस बार गांव के दिन फिरने वाले हैं।

    भिवानी। वक्त सदा एक सा नहीं रहता। हर काली रात की सुबह होती है, वर्ष 2018 भिवानी के गांव रोहनात के लोगों के लिए बेहद रोमांच से भर देने वाली खबर लेकर आया है। 1857 के गदर के वक्त से गुलामी का दंश झेल रहे इस गांव में पहली बार कोई मौका होगा, जब गणतंत्र दिवस मनाया जाएगा। अब से पहले न तो यहां कभी आजादी दिवस मनाया गया है और न ही गणतंत्र दिवस। ऐसे में झंडा फहराने का तो सवाल ही पैदा नहीं होता, पर इस बार दशकों पुरानी यह तस्वीर बदलने वाली है। दरअसल 1858 में इस गांव की एक-एक इंच को इसलिए नीलाम कर दिया गया था कि गांव के बाशिंदों ने 1857 के गदर में अंग्रेजी हुकूमत की ईंट से ईंट बजा दी थी। ऐसी है रोहनात की काली रातों की कहानी...

    - देश की आजादी में हरियाणा के जिन वीर सपूतों ने अपना अहम योगदान दिया, उन वीर सपूतों में भिवानी जिले के गांव रोहनात के लोगों के भी नाम शुमार हैं।
    - 29 मई 1857 को रोहनात गांव के वीर जांबाजों ने बहादुरशाह के आदेश पर अंग्रेजी हुकूमत की ईंट से ईंट बजा दी। ग्रामीणों ने जेलें तोड़कर कैदियों को आजाद करवाया। 12 अंग्रेजी अफसरों को हिसार व 11 को हांसी में मार गिराया।
    - इससे बौखलाकर अंग्रेजी सेना ने गांव पुट्‌ठी के पास तोप लगाकर गांव के लोगों को बुरी तरह भून दिया। सैकड़ों लोग जलकर मर गए, मगर फिर भी ग्रामीण लड़ते रहे। इतना ही नहीं इसके बाद भी अंग्रेजों ने जुल्म-ओ-सितम जारी रखे। औरतों व बच्चों को कुएं में फेंक दिया। दर्जनों लोगों को सरेआम जोहड़ के पास पेड़ों पर फांसी के फंदे पर लटका दिया।
    - इस गांव के लोगों पर अंग्रेजों के अत्याचार की सबसे बड़ी गवाह हांसी की एक सड़क है। इस सड़क पर बुल्डोजर चलाकर इस गांव के अनेक क्रांतिकारियों को कुचला गया था, जिससे यह रक्तरंजित हो गई थी और इसका नाम लाल सड़क रखा गया था।
    - ग्रामीणों के अनुसार देश की आजादी के आंदोलन में सबसे अधिक योगदान के बावजूद उनके साथ जो हुआ, उसकी कसक आज भी उनके दिल में है। 14 सितंबर 1857 को अंग्रेजों ने इस गांव को बागी घोषित कर दिया व 13 नवंबर को पूरे गांव की नीलामी के आदेश दे दिए गए।
    - 20 जुलाई 1858 को गांव की पूरी 20656 बीघे जमीन व मकानों तक को नीलाम कर दिया गया। इस जमीन को पास के पांच गांवों के 61 लोगों ने महज 8 हजार रुपए की बोली में खरीदा। अंग्रेज सरकार ने फिर फरमान भी जारी कर दिया कि भविष्य में इस जमीन को रोहनात के लोगों को न बेचा जाए।
    - धीरे-धीरे स्थिति सामान्य हो गई और यहां के लोगों ने अपने रिश्तेदारों के नाम कुछ एकड़ जमीन खरीदकर दोबारा गांव बसाया, मगर लोगों को मलाल आज भी है कि देश की आजादी के लिए अपना सबकुछ खो देने के बावजूद उन्हें वो जमीन तक नहीं मिली, जिसके लिए आज तक लड़ाई लड़ रहे हैं।

    2010 में लहराए थे काले झंडे

    - रोहनात के ग्रामीणों ने 2010 में स्वतंत्रता दिवस के दिन गांव में काले झंडे लहराए थे, जिसके बाद एकाएक प्रशासन हरकत में आ गया था। हालांकि बाद में ग्रामीणों को प्रशासन के आश्वासन के बाद मना लिया गया।

    - सरपंच रविंद्र, पूर्व सरपंच अमीर सिंह व नगराधीश महेश कुमार बताते हैं कि वो भारत के संविधान व तिरंगे का आदर करते हैं, लेकिन जिन क्रांतिकारी रूपी उनके पूर्वजों ने देश की स्वतंत्रता में अपने बलिदान की आहूति दी, उनके बारे में भी सरकार को सोचना चाहिए। क्या गांव की शहादत को ध्यान में लाना सरकार के लिए जरूरी नहीं है।

    - प्रदेश की बंसीलाल सरकार की तरफ से क्रांतिकारी परिवारों के लिए 64 लाख 32 हजार रुपए का क्लेम बनाया गया था और सवा लाख रुपए बतौर इनाम भी घोषित किया गया। वो इनाम तो गांव को मिल गया, मगर आज तक वो क्लेम ग्रामीणों को नहीं मिल पाया है।

    ऐसे बदली तस्वीर
    - गुलामी का दंश झेलकर तंग आ चुके लोगों की आवाज को बवानीखेड़ा हलके के विधायक बिशंभर वाल्मीकि ने भी उठाया था व उनके नेतृत्व में अगस्त 2017 में सीएम से भिवानी दौरे के दौरान लोगों ने मुलाकात की। विधायक ने उस वक्त कहा था कि सीएम ने पूरे मामले में सकारात्मक रुख दिखाते हुए उपायुक्त को मामले की जांच की बात कही है।
    - थक-हार चुके लोगों ने सीएम मनोहर लाल से मुलाकात के बाद उम्मीद जताई थी व मामले में कार्रवाई शुरू हुई तो अब सीएम ने बड़ा तोहफा इन लोगों को देने की बात कही। सीएम ने अधिकारियों को गांव की समस्याओं को जानकर उनके निराकरण के निर्देश दिए हैं।
    - अब सूबे के मुख्यमंत्री मनोहर लाल खुद 26 जनवरी को इस गांव में आएंगे व विकास कार्यों की घोषणा व लोकार्पण करेंगे।

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    गांव के बाहर खड़े ये पेड़ भी गांव की कुर्बानी के गवाह हैं। इन्हीं पर अंग्रेजों ने लोगों को लटका-लटकाकर मार डाला था।
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    गांव के बाहर स्थित वह ऊबड़-खाबड़ जगह, जो गांव के विकास के लिए इंतजार की कहानी कहती नजर आती है।
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    अब तक की सरकारों ने कभी इस गांव पर ध्यान नहीं दिया, जिसका जवाब मांगता गांव के हित में छपवाया गया बीते वर्षों का यह पंफलेट हमें सोचने पर मजबूर करता है।
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    गांव के कुएं में पानी है, लेकिन इसका पानी कोई इस्तेमाल नहीं करता।
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    कीचड़ से सनी हैं गांव की गलियां। यही कारण है कि यहां के लोग खुद को गुलाम मानते हैं।
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    ये हांसी का ऐतिहासिक किला है, जिसके गेट को जाती सड़क को आज भी लाल सड़क कहा जाता है। यह सड़क गांव रोहनात पर हुए अत्याचार की कहानी की गवाह है।
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    गांव के स्वर्णिम इतिहास और मौजूदा चिंताजनक हालात के बारे में बात करते ग्रामीण।
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    गांव के स्वर्णिम इतिहास और मौजूदा चिंताजनक हालात के बारे में बात करते ग्रामीण महेश कुमार।
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    बवानीखेड़ा के विधायक विशंभर वाल्मीकि, जिनके साथ लोग सीएम से मिले थे। अब सीएम को आश्वासन इस गांव के लिए अमृतधारा बनने वाला है।
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    हालांकि गांव में ग्रामीण बैंक की शाखा भी है, लेकिन बावजूद इसके यह विकास को तरस रहा है।
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Web Title: Rohnat A Village Where No Republic Day No Independence Day Being Celebrated
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