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एक हाथ से खेती करता है ये शख्स, ऐसे होता है हर साल 10 लाख का फायदा

Ajay Bhatia | Last Modified - Dec 19, 2017, 07:18 PM IST

रेवाड़ी के भाड़ावास गांव का रहने वाला है किसान भूपेंद्र।
    • परंपरागत खेती के अलावा मछली पालन, मशरूम उत्पादन और सब्जियां भी उगाते हैं भूपेंद्र।

      रेवाड़ी। 15 साल पहले खेत में काम करते समय किसान भूपेंद्र सिंह का थ्रेशर से एक हाथ कट गया। कुछ वक्त के लिए मानों सब कुछ रुक-सा गया, कामकाज करना मुश्किल हो गया। लेकिन समय बीता तो भूपेंद्र सिंह ने खुद को मानसिक रूप से मजबूत किया और इस अपंगता को अपनी तरक्की में कतई आड़े नहीं आने दिया। एक हाथ न होने के बाद भी खेती में नए-नए प्रयोग किए और एक प्रगतिशील किसान के रूप में पहचान बनाई। आज हालत ये है कि भूपेंद्र सिंह राष्ट्रीय स्तर पर कई कृषि पुरस्कार जीत चुके हैं। वे परंपरागत खेती के साथ मछली पालन, वर्मी कंपोस्ट, मशरूम, सब्जियां और एलोवेरा उगाकर लाखों रुपए सालाना कमा रहे हैं। आगे पढ़िए किसान भूपेंद्र का पूरा सफर...

      - गांव भाड़ावास निवासी 59 वर्षीय भूपेंद्र सिंह किसानों के लिए उदाहरण बने हुए हैं। वे खेती से सालाना 10 से 12 लाख रुपए का मुनाफा कमाते हैं।
      - भूपेंद्र सिंह 20 साल की उम्र से खेती कर रहे हैं। परंपरागत खेती से विशेष लाभ नहीं होता देख उन्होंने नई तकनीक के साथ खेती करनी शुरू कर दी।
      - 2002 में थ्रेशर मशीन में हाथ आ गया और कट गया। कई महीने वे उपचार करवाते रहे।

      - उन्होंने हार नहीं मानी, अपने आप को मानसिक तौर पर मजबूत किया और दोबारा खेती करनी शुरू की।

      - भूपेंद्र सिंह ने कृषि विशेषज्ञों की सलाह से मछली पालन के लिए अपनी दो एकड़ भूमि पर दो तालाब बना लिए। मछली पालन से उन्हें डेढ़ से पौने दो लाख रुपए तक अतिरिक्त कमाई हो रही है।

      - इस दौरान उन्होंने यूरिया के प्रयोग को कम करने के लिए वर्मी कंपोस्ट प्लांट (केंचुए की खाद) लगाया। साथ ही, वे गोबर गैस प्लांट भी लगा रहे हैं।
      - वर्मी कंपोस्ट, गोबर गैस प्लांट की नियमित खाद के साथ ही तालाबों से हर पांच साल में अच्छी-खासी खाद मिलती है। इससे यूरिया का प्रयोग सीमित मात्रा में ही करना पड़ रहा है। जिससे कि भूपेंद्र अच्छी पैदावार और कमाई ले रहे हैं।
      - खेत के कुछ हिस्से में वे सब्जी भी उगाते हैं, इस कारण बाजार से सब्जियां लाने की बजाय सप्लाई ही करते हैं तथा दूसरे किसानों को पौधे भी देते हैं।मुनाफे के लिए ऐलोवेरा भी उगा रहे हैं।

      नेशनल लेवल पर जीते पुरस्कार
      - भूपेंद्र ने खेती में कई अवॉर्ड भी जीते हैं। पहली बार पुरस्कार 1991-92 में गेहूं व सरसों के लिए मिला। हाथ कटने के बाद भी खेती में नए प्रयोगों के चलते उन्हें मैनेजमेंट के लिए 2003 में राज्य स्तरीय देवीलाल पुरस्कार मिला।
      - वर्ष 2006-07 में नेशनल लेवल पर भी खेती में मैनेजमेंट के लिए अवॉर्ड मिला। मछली पालन में वर्ष 2015 में उन्हें रेवाड़ी जिला के लिए अवॉर्ड दिया गया है।
      - इसके अलावा इफ्को सहित अन्य कृषि से जुड़े विभाग व संस्थाओं द्वारा उन्हें कई बार सम्मानित किया गया। उनके पास सम्मान के ऐसे 50 से ज्यादा प्रशस्ति पत्र हैं।

      तालाब के ऊपर बनाएंगे मुर्गी फार्म
      - 59 साल की उम्र में भी सीखने की ललक। खेती की तकनीक सीखने के लिए भूपेंद्र दूर-दराज के जिलों में भी पहुंच जाते हैं।
      - 2015 में वे करनाल में चल रहे कैंप में मशरूम की खेती के लिए प्रशिक्षण लेकर आए तथा दो साल तक खेती की। लेकिन बीमार होने से यह काम अभी बंद कर दिया।
      - अब उन्होंने मछली पालन के लिए बनाए जोहड़ पर मुर्गी फार्म बनाने का प्रोजेक्ट तैयार कराना शुरू कर दिया है। दो माह में यह काम भी पूरा हो जाएगा।

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      खेत में पानी देने के लिए पाइप लेकर जाते हुए किसान भूपेंद्र।
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      सरकार द्वारा आयोजित एक सम्मान समारोह में किसान भूपेंद्र। (फाइल)
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      खेत में काम करते हुए किसान भूपेंद्र। (बायें)। अपने अवॉर्ड दिखाते हुए किसान। (दायें)
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      खेत में चाय की चुस्की का आनंद लेते हुए भूपेंद्र।
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      भाषा भारती द्वारा भूपेंद्र को दिया गया पुरस्कार।
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      खेत में पानी लगाने की तैयारी करते हुए भूपेंद्र।
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      गुजरात में वर्ष 2013 में आयोजित कृषि समिट में सम्मानित भूपेंद्र का सर्टिफिकेट।
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      खेत में काम करवाते हुए भूपेंद्र।
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    Web Title: Story Of National Award Winner Farmer Bhupender Who Earn 10 Lakh Yearly
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