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हिरहबलीाीइा लनीाउलनीएा हलइीव ण्ए२लहपीर

हिरहबलीाीइा लनीाउलनीएा हलइीव ण्ए२लहपीर

Balraj Singh | Last Modified - Nov 15, 2017, 06:48 PM IST

सोनीपत। हमारे हौसलों की उड़ान देखनी है तो आसमान से कह दो कि खुद को और ऊंचा कर ले। ऐसी ही कहानी है हाल ही में एशिया कप में विनर रही भारतीय महिला हॉकी टीम की डिफेंडर नेहा गोयल की। बरसों पहले पिता छोड़कर चले गए। मां ने तीन बेटियों को मजदूरी करके पाला, वहीं नौबत यहां तक आ गई थी कि नेहा के पास खेलने को जूते और हॉकी स्टिक भी नहीं थी। दूसरे खिलाड़ियों के पुराने जूतों और स्टिक से खेलकर आज नेहा इस मुकाम पर पहुंच गई है।

आज नेहा के 22वें जन्मदिन के मौके पर dainikbhaskar.com इस होनहार की सक्सेस स्टोरी से आपको रू-ब-रू करा रहा है।

- नेहा की फैमिली मूल रूप से सोनीपत के गांव कालूपुर की है। अब पूरा परिवार आर्य नगर में छोटे से घर में रहता है। पिता लगभग 15 साल पहले घर छोड़कर चले गए थे। उसके बाद घर की पूरी जिम्मेदारी मां सावित्री के सिर पर आ गई और उन्होंने तीन बेटियों को मेहनत-मजदूरी करके पाला है। उन्होंने दूसरों के घरों में झाडू़-पोछा लगाया, फैक्ट्री में चमड़ा काटने का काम किया।

- इन्हीं में से एक नेहा इन दिनों बीए की स्टूडेंट है। बड़ी बहन की शादी हो चुकी है। छोटी ब्यूटी पॉर्लर में 2500 रुपए की नौकरी करती है।

- नेहा ने हॉकी में दो बार भारत को चैंपियन बनाया और बेस्ट प्लेयर का अवार्ड हासिल किया। इसके सहारे ही रेलवे में नौकरी मिल गई। मां सावित्री कहती हैं, 'मैंने कुछ नहीं किया सिर्फ मां होने का फर्ज निभाया है। यह तो नेहा की लगन और मेहनत है जो वह यहां तक पहुंची है। मैं तो मजदूरी करती थी। दो वक्त का खाना भी बमुश्किल से जुटा पाती थी। तीन बेटियों की परवरिश करना आसान नहीं था, लेकिन मैंने किसी के आगे हाथ नहीं फैलाया। दिन-रात मेहनत की और जो हो सका वह किया। बेटियों ने भी पूरा साथ दिया। आज मुझे नेहा की मम्मी के नाम से लोग जानते हैं।'

उधार के जूतों व स्टिक से ऐसे हुई थी खेल की शुरुआत

- नेहा की अर्जुन अवार्डी कोच प्रीतम सिवाच बताती हैं, 'नेहा सिर्फ 10 साल की थी। एक दिन वह आकर मुझसे बोली दीदी मैं भी खेलूंगी। मुझे भी आप जैसा बनना है, पर मेरे पास न तो स्टिक है और न ही जूते। इन्हें खरीदने के लिए पैसे भी नहीं हैं। मम्मी मजदूरी करके हम तीनों बहनों को पाल रही हैं। मैं उनका बोझ कम करना चाहती हूं। प्लीज मुझे भी हॉकी खेलना सिखाइए। यह सुनकर मेरी आंखें भर आईं थी।
- प्रीतम सिवाच का कहना है कि बच्ची नेहा को एकेडमी ले जाकर दूसरे बच्चों के पुराने जूते और स्टिक दी तो उसका चेहरा खुशी से खिल उठा था।

नेहा की उपलब्धियां
- नेहा ने 13 वर्ष की उम्र में सीनियर नेशनल हॉकी स्पर्धा में खेलते हुए रजत पदक जीता।

- 14 साल की उम्र में जूनियर नेशनल खेलने के बाद 2011 में जूनियर एशिया कप खेला और उसमें देश को कांस्य पदक दिलाने में अहम भूमिका निभाई।

- 2013 मेंं स्कॉटलैंड में जूनियर टेस्ट सीरीज में स्वर्णिम प्रदर्शन किया।

- 2014 में जूनियर नेशनल हॉकी स्पर्धा मेंं हरियाणा की कप्तान रहीं और स्वर्ण पदक दिलाया।

- 2015 में जूनियर नेशनल व बाद में नेशनल गेम में स्वर्ण पदक झटके। वर्ष 2015 मेंं रेलवे ने उन्हें क्लर्क के रूप में भर्ती किया।

- 2016 में अंडर-18 में एशिया कप के लिए चयन हुआ। कांस्य पदक झटका। नेशनल गेम्स में स्वर्ण पदक जीता। लाल बहादुर शास्त्री अंतर्राष्ट्रीय हॉकी टूर्नामेंट में अंडर-21 आयु वर्ग में सर्वश्रेष्ठ खिलाड़ी के खिताब से नवाजा गया।

- 2016 में सीनियर नेशनल हॉकी स्पर्धा में रेलवे की ओर से खेलते हुए नेहा को सर्वश्रेष्ठ डिफेंडर खिलाड़ी का खिताब मिला। एशिया कप में वे सभी 5 मैच में टीम का हिस्सा रहीं।

मां को दूंगी हर खुशी: नेहा
- हॉकी खेलने के जुनून से बुलंदियां छू चुकी नेहा कहती हैं, 'मुझे यहां तक पहुंचाने के लिए मां ने बहुत कष्ट सहे हैं। अब मैं उन्हें हर खुशी देना चाहती हूं। अभी तो मुझे लंबा सफर तय करना है। खुद को साबित करना है। इसके बाद राष्ट्रमंडल और एशियाई खेल होने हैं। मैं इन दोनों टूर्नामेंटों में देश का प्रतिनिधित्व करना चाहती हूं।'

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Web Title: ye hai hoki ki is neshnl pleyr ka ghr, pitaa ne chhodeaa, maan ne aise ki parvrish
(News in Hindi from Dainik Bhaskar)

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