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इलाज को 6 साल बाद मिले 2.50 लाख रुपए, तब तक कर्जा हो गया ‌7 लाख

वाहनों को व्यवस्थित करने के दौरान एक टाटा-407 गाड़ी का टायर उसके पैर के पंजे के ऊपर से निकल गया।

अजय भाटिया | Last Modified - Dec 28, 2017, 07:41 AM IST

  • इलाज को 6 साल बाद मिले 2.50 लाख रुपए, तब तक कर्जा हो गया ‌7 लाख

    रेवाड़ी. गांव बीकानेर निवासी 46 वर्षीय गणेश कुमार, 16 साल तक होमगार्ड नौकरी की, मगर 11 साल पहले हुए एक हादसे ने उसे पुलिस के डंडे की बजाय बैसाखी थमा दी। तब लगा कि चोट मामूली है, मगर बाद में जख्म इतना बढ़ता गया कि 2008 में घुटने के पास से पैर ही काटना पड़ गया। 6 साल बाद उपचार के लिए राशि मिली, वो भी महज 2.50 लाख रुपए, लेकिन तब तक 7 लाख रुपए कर्ज हो चुका था। घर के हालात ये हैं कि बिजली बिल 30 हजार रुपए से ज्यादा हो गया तो महीनेभर पहले बिजलीकर्मी मीटर उखाड़ ले गए। पत्नी की कानों की बालियां 5 हजार रुपए में गिरवी रख, फिर से कनेक्शन जुड़वाया।


    11 साल से सिस्टम के खिलाफ हक की लड़ाई लड़ रहा गणेश डीसी व सीएम से लेकर पीएम तक पत्र भेज चुका है, लेकिन सुनवाई कहीं नहीं हा़े पाई। गृहरक्षी (होमगार्ड) विभाग से अब कुछ मिलने की उम्मीद नहीं। इसलिए बेटे काे भी कहीं नौकरी मिल जाए, इसी की आस लिए गणेश बैसाखी के सहारे दफ्तरों के चक्कर लगा रहा है।

    पीड़ित गणेश बोला- हादसे ने जिंदगी ला दी बैसाखियों पर

    1990 में मैं गृहरक्षी विभाग में भर्ती हुआ। 2006 तक लगातार होमगार्ड की नौकरी की, कई जिलों में उसकी तैनाती रही। 2006 में एक दिन वह रेवाड़ी बस स्टैंड के सामने ट्रैफिक पुलिस के साथ ड्यूटी पर था। वाहनों को व्यवस्थित करने के दौरान एक टाटा-407 गाड़ी का टायर उसके पैर के पंजे के ऊपर से निकल गया। पंजे में फ्रेक्चर हो गया, लेकिन साथी पुलिसकर्मियों ने कहा कि मामूली चोट है, केस करने जैसी कोई बात नहीं है। इसके बाद भी उसने कुछ दिन ड्यूटी की, लेकिन धीरे-धीरे पंजे का घाव बढ़ना शुरू हो गया। कुछ ही दिन में उसने बिस्तर पकड़ लिया। इलाज के पैसे नहीं थे, इस कारण 2007 में कोर्ट में केस डाला, लेकिन उपचार के अभाव में 3 बार पैर काटा गया।

    पहले घुटने से नीचे, संक्रमण नहीं रुका तो घुटने पर से तथा फिर तीसरी बार घुटने के ऊपर (जांघ) से पैर काटना पड़ा। उसका हाल पूछने के लिए चंडीगढ़ से डीजी लेवल तक के अधिकारी आए और मदद का भरोसा दिलाया। अधिकारियों से सरकार तक पत्र भेजे मगर मेरी हालत का समाधान किसी ने नहीं निकाला। ढाई लाख रुपए बतौर मुआवजा मिले, लेकिन तब तक करीब 7 लाख रुपए कर्जा हो चुका था। जिसे आज तक चुका रहा हूं। कष्ट निवारण समिति की बैठक में पीडब्ल्यूडी मंत्री के सामने भी मैंने अपना कष्ट रखते हुए बेटे को डीसी रेट पर ही नौकरी लगाने गुहार लगाई तो उन्होंने भी उन अधिकारियों की ओर इशारा कर दिया, जिनके पास वह रोज सुनवाई के लिए भटक रहा है।

    सेवानिवृत डिस्ट्रिक्ट कमांडर रघुबीर सिंह बोले- निकल सकता है समाधान

    गृह रक्षी विभाग के सेवानिवृत डिस्ट्रिक्ट कमांडर रघुबीर सिंह बताते हैं कि कार्यरत डिस्ट्रिक्ट कमांडर के पास पावर है कि किसी कर्मचारी की इतनी दुर्दशा है तो मानवता के नाते उसके बेटे को होमगार्ड लगा सकते हैं। चौकीदार पद पर रात के समय खुद गणेश भी काम कर सकता है, वहां ताला खोलने और बंद करने का ही काम रहता है। इसके लिए वे खुद लिखकर दे चुके हैं, मगर रिटायर्ड पर्सन हूं, इसलिए मेरे लिखने की भी वैल्यू नहीं समझी जा रही।

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Web Title: Government System Negligence In Giving Money For Treatment
(News in Hindi from Dainik Bhaskar)

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