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जिले में भी स्मॉग का स्तर बढ़ा, लोगों को सुबह सांस लेने में हो रही परेशानी

Dainik Bhaskar

Nov 11, 2018, 03:15 AM IST

Rewari News - जिले के धारुहेड़ा से सटे भिवाड़ी में प्रदूषण का स्तर 8 नवंबर को पीएम10@ 306 माइक्रो ग्राम क्‍यूबिक मीटर (एमजीसीएम) दर्ज...

Bawal - smog in the district also increased people are having difficulty breathing in the morning
जिले के धारुहेड़ा से सटे भिवाड़ी में प्रदूषण का स्तर 8 नवंबर को पीएम10@ 306 माइक्रो ग्राम क्‍यूबिक मीटर (एमजीसीएम) दर्ज किया गया था, जो कि बेहद खराब स्तर में आता है। लेकिन ये आंकड़ा 10 नवंबर को 84 मोइकाेग्राम बढ़कर 390 एमजीसीएम पर पहुंच गया। भिवाड़ी के लिए तो यह चिंता का विषय है ही, लेकिन जिला के लोगोें के लिए भी यह खतरे की घंटी से कम नहीं है। क्योंकि सुबह के समय स्मॉग का स्तर देखने से पता चलता है कि यहां के हालात भी बिगड़ रहे हैं। वहीं सड़कों पर उड़ती धूल भी चिंता का विषय है।

प्रदूषण बढ़ने का सबसे बढ़ा कारण धूल के कण होते हैं, इसके लिए सड़कों पर जल छिड़काव जरूरी होता है। यही कारण था कि केंद्र की अाेर से राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र में 1 से 10 नवंबर तक निर्माण कार्यों पर रोक लगा दी गई थी। लेकिन रेवाड़ी-धारुहेड़ा व बावल स्थानीय निकाय की ओर से सड़क पर सफाई व जल छिड़काव जैसे इंतजात होते कहीं दिखाई नहीं दिए।

बेहद खराब स्तर पर पहुंचा चुका है प्रदूषण का लेवल : पीएम10 व पीएम2.5 से तात्पर्य हवा में प्रदूषण के स्तर के साथ धूल के कणों के साइज से है। शनिवार की रिपोर्ट में भिवाड़ी में पीएम10 का लेवल 390 माइक्रो ग्राम क्‍यूबिक मीटर (एमजीसीएम) पर पहुंच चुका है। जबकि सांस लेने के लिए ये मात्रा 0- 50 होनी चाहिए थी। ऐसे में आसानी से समझा जा सकता है कि कितने खतरनाक स्तर पर प्रदूषण का स्तर पहुंच चुका है। जिले में प्रदूषण स्तर जांच के लिए कोई ऑनलाइन मशीन नहीं है। ऐसे में यहां से सैंपल भरकर जांच के लिए भेजे जाते हैं।



पॉलीथीन व स्मोग....सेक्टर चार स्थित खाली प्लाट में पड़ी पॉलीथीन व दोपहर 2:30 बजे आसमान में छाया स्मोग।

फेफड़ों के लिए घातक....

पर्यावरण विशेषज्ञों का कहना है कि पीएम 10 को रेस्पायरेबल पर्टिकुलेट मैटर कहते हैं। इन कणों का साइज 10 माइक्रोमीटर होता है। इससे छोटे कणों का व्यास 2.5 माइक्रोमीटर या कम होता है। इसमें धूल, गर्द और धातु के सूक्ष्म कण शामिल होते हैं। पीएम 10 और 2.5 धूल, कंस्‍ट्रक्‍शन और कूड़ा व पुआल जलाने से ज्यादा बढ़ता है। ये खतरनाक कण इतने सूक्ष्म होते हैं कि सांस के जरिए ये हमारे फेफड़ों में पहुंच जाते हैं। सांस लेते वक्त इन कणों को रोकने का हमारे शरीर में कोई सिस्टम नहीं है। ऐसे में पीएम 2.5 हमारे फेफड़ों में काफी भीतर तक पहुंचता है। ये बच्चों और बुजुर्गों को सबसे ज्यादा नुकसान पहुंचाता है।

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