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पापा और नानी को बच्चों ने पहनाया गोल्ड मेडल तो भर आई आंखे

अगर पढ़ाई के प्रति ललक हो तो न उम्र बाधा बनती है और न ही विपरीत परिस्थितियां।

Dainik Bhaskar

Feb 14, 2018, 06:30 AM IST
17th Convocation of Maharishi Dayanand University

रोहतक. अगर पढ़ाई के प्रति ललक हो तो न उम्र बाधा बनती है और न ही विपरीत परिस्थितियां। बस, योद्धा अर्जुन की तरह लक्ष्य साफ होना चाहिए। ऐसे कई उदाहरण देखने को मिले महर्षि दयानंद यूनिवर्सिटी के 17वें दीक्षांत समारोह में। मंगलवार को टैगोर ऑडिटोरियम में समारोह हुआ। जिसमें यूजी, पीजी और पीएचडी के गोल्ड मेडलिस्ट ने अपने इन खास पलों को उन लोगों के साथ यादगार बनाया, जिनकी स्पोर्ट और विश्वास से वे इस मुकाम तक पहुंचे थे।

इसमें अभिभावक भी थे, सास-ससुर भी और दादी-नानी, भाई-बहन, जीवनसाथी, दोस्त और सीनियर्स। किसी ने खुद का बेस्ट देने के लिए दम लगाया तो किसी ने अपने पापा और नानी के लिए गोल्ड जीता। यही नहीं, कोई चाहता था कि उनके पापा को सिक्योरिटी गार्ड से नहीं प्रोफेसर के पिता से पहचान मिले इसलिए रोजाना गांव से यूनिवर्सिटी से आकर रेगुलर पढ़ाई की। सोशल मीडिया से भी दूरी बनाकर रखी। वहीं, कुछ ने गोल्ड मेडलिस्ट पापा की बेटी गोल्ड मेडलिस्ट कहलाने के लिए दिन-रात एक किया।


सिक्योरिटी गार्ड नहीं, गोल्ड मेडलिस्ट बेटी के पिता से जानेंगे
मेरे पिता जयवीर सिंह पीजीआई में गार्ड हैं। वे खुद 8वीं पास है, लेकिन मेरी पढ़ाई में कभी बाधा नहीं आने दी। ग्रामीण क्षेत्र से होने के बावजूद दूसरों की परवाह किए बिना मुझे पढ़ने के लिए गांव से बाहर भेजा। मेरे पापा को सिक्योरिटी गार्ड नहीं, गोल्ड मेडलिस्ट बेटी के पिता से जानें इसलिए इतनी मेहनत की। पापा का सपना मुझे आईएएस बनना देखना है, जो मैं पूरा करूंगी। - सोनी, एमए इकोनॉमिक्स ऑनर्स, ब्राह्मणवास।

मां-नानी जो नहीं कर पाई, वह सपना दोहती ने पूरा किया
मैंने जिनके लिए गोल्ड मेडल हासिल किया है, वे दोनों आज मेरे साथ है। मां दीपा शर्मा और नानी रेखा शर्मा ने मुझे हमेशा स्पोर्ट किया है। नानी के बनाए अचार ने कभी उनकी कमी महसूस ही नहीं होने दी। उन दोनों का सपना था कि उनकी दोहती गोल्ड मेडलिस्ट हो, जो आज पूरा हो गया है। टीचर मां की उम्मीद कहीं छूट गई थी, पर अब वह फिर से जाग गई है। - विभूति शर्मा, बिजनेस इकोनॉमिक्स, फरीदाबाद।

23 साल पहले पापा बने थे गोल्ड मेडलिस्ट, अब बनी बेटी
मेरे पापा डॉ. सुधीर मलिक बाबा मस्तनाथ स्कूल में शिक्षक है। 23 साल पहले पापा गोल्ड मेडलिस्ट बने थे और अब मैंने। अब हमारी पहचान गोल्ड मेडलिस्ट पापा-बेटी की जोड़ी से जानी जाएगी। जॉब करने के बाद शाम को पापा हमेशा मुझे पढ़ाया करते थे। मेरा अगला लक्ष्य इंग्लिश में ही एमए कर दूसरी बार गोल्ड मेडल लेना है। साथ ही, आर्मी ज्वाइन कर देश की सेवा करना है। - दिक्षांशी मलिक, बीए इंग्लिश ऑनर्स, काठमंडी रोहतक।

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