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फाने और पराली जलाने से मिलेगी मुक्ति, पर्यावरण के लिए भी फायदे का सौदा साबित होगी तकनीक

आनंद शर्मा | Last Modified - Dec 18, 2017, 06:47 AM IST

पंजाब के किसानों द्वारा फसलों के अवशेष जलाने का मुद्दा प्रत्येक वर्ष हर आम और खास के लिए चर्चा की वजह बनता है।
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    महेंद्रगढ़. दिल्ली-एनसीआर में प्रदूषण बढ़ते ही हरियाणा, पंजाब के किसानों द्वारा फसलों के अवशेष जलाने का मुद्दा प्रत्येक वर्ष हर आम और खास के लिए चर्चा की वजह बनता है। हवा में प्रदूषण की बढ़ी मात्रा इस समस्या के समाधान को लेकर भी खूब विचार-विमर्श होता है, लेकिन मौसम का मिजाज सुधरते ही बात आई गई हो जाती है। फसलों के इसी अवशेष की समस्या का समाधान करने की दिशा में हरियाणा केंद्रीय विश्वविद्यालय के कुलपति व दिल्ली विवि में माइक्रोबॉयोलॉजी के प्रोफेसर आरसी कुहाड़ ने खोज कार्य किया है। खास बात है कि प्रो. कुहाड़ व उनकी टीम ने फसलों के अवशेष से निपटने के लिए एक-दो नहीं, बल्कि चार पर्यावरण हितैषी विकल्प इजाद किए हैं।

    कृषि अवशेष से एथेनॉल बनाने की तकनीक इजाद की, सरकार की योजना भी हो सकती है पूरी

    प्रो. आरसी कुहाड़ ने बताया कि वे फसलों के अवशेष के उपयोगी समाधान को लेकर लंबे समय से काम कर रहे हैं। नवीन एवं नवीकरणीय ऊर्जा मंत्रालय के आंकड़ों के अनुसार भारत में करीब 546 मीट्रिक टन फसलों का अवशेष (बायोमास) हर वर्ष उपलब्ध रहता है। इसमें से 120 से 150 मीट्रिक टन बायोमास निपटान के विभिन्न उपायों के बावजूद अतिरिक्त बच जाता है। हमारी टीम इसी बायोमास के बेहतर उपयोग की दिशा में काम कर रही है। इस प्रयास के अन्तर्गत उन्होंने दिल्ली विश्वविद्यालय के साउथ कैम्पस में लिग्नोसेल्युलस बॉयोटेक्नोलॉजी लेबोरेट्री की माध्यम से एक-दो नहीं, बल्कि फसलों के अवशेषों के बेहतर प्रयोग के लिए बायोफ्यूल जैव ईंधन बनाना, पशुओं के लिए पौष्टिक चारा, बायो-कम्पोस्ट और पेपर ब्लीचिंग में क्लोरिन ड्राई ऑक्साइड के प्रयोग को कम करने के चार विकल्प खोजे हैं।

    फसलों के अवशेष से पर्यावरण को होने वाले नुकसान से बचाने की दिशा में उनकी खेाज बेहद कारगर साबित हो सकती है, बशर्ते कि इन तकनीकों को बड़े पैमाने पर भी टेस्ट कराने की सुविधाएं उपलब्ध कराई जाएं। इसी उद्देश्य से आगे बढ़ते हुए यही कार्य हकेंवि में भी शुरू किया है। इस कार्य में प्रो. आरसी कुहाड़ की टीम में डॉ. रिषि गुप्ता, डॉ. भुवनेश श्रीवास्तव, डॉ. मुकेश कपूर, डॉ. कृष्णकांत शर्मा, डॉ. पीयूष चंदना, डॉ. कवीश जैन और डॉ. जितेंद्र सैनी आदि शामिल हैं।

    बायोफ्यूल:प्रो. कुहाड़ की टीम ने फसलों के अवशेष से बायोफ्यूल तैयार की। अगर कुछ और प्रयास कर अधिक फायदेमंद बना लिया जाए तो भारत सरकार की ओर से अनिवार्य पेट्रोलियम में पांच फीसदी ऐथेनॉल के उद्देश्य को हासिल करने में उपयोगी रहेगी। यह प्रोजेक्ट विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी मंत्रालय की मंजूरी से किया गया।

    पशुओं का चारा: फसलों के अवशेष को फंगस से फॉर्मेंट कराके इसमें प्रोटीन की उपलब्धता में इजाफा किया जाता है। यह चारा सामान्य चारे की अपेक्षा बेहतर होता है और इससे पशु के वजन में इजाफे के साथ-साथ सामान्य चारे को पौष्टिक बनाने में प्रयोग में आने वाले चोखर आदि की मांग में भी कमी देखने को मिलती है।

    खाद का निर्माण: फसलों के अवशेष से खेतों के लिए उपयोगी खाद के निर्माण का काम भी प्रयोग प्रो. आरसी कुहाड़ ने किया है। इस टीम के द्वारा तैयार बायो-कम्पोस्ट के माध्यम से जब जांच की गई तो पाया गया कि पौधे की गुणवत्ता पहले से बेहतर हो रही है। इतना ही नहीं इसमें मिट्टी की उर्वरक क्षमता में भी इजाफा देखने को मिला।

    पेपर ब्लीचिंग में उपयोग: कागज की लुग्धी को सफेद रंग प्रदान करने के लिए इंडस्ट्री में क्लोरिन डाई-ऑक्साइड का इस्तेमाल किया जाता है। जो पर्यावरण के लिए हानिकारक है। इसके लिए फसलों के अवशेषों का फॉर्मेंट कर एन्जाइम्स, जायलेनेज व लेकेज बनाए हैं। इससे क्लोरिन डाई-ऑक्साइड की 35% मात्रा को कम किया जा सकता है। यह कार्य सीपीपीआरआई, सहारनपुर की मदद से किया गया।

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Web Title: Salvation By Burning Remains Of Crops
(News in Hindi from Dainik Bhaskar)

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