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35 गांवों में दो साल से ‘पैडवुमन’, 3.5 रु. में लेडीज तक घर-घर पहुंचा रहीं हैं सेनेटरी पैड

यह फिल्म तमिलनाडु में पैडमैन के नाम से मशहूर अरुणाचालम मुरुगनाथम के जीवन पर बनी है।

Dainik Bhaskar

Jan 22, 2018, 07:12 AM IST
Sucess story of Pad woman

झज्जर. अक्षय कुमार स्टारर फिल्म पैडमैन इन दिनों काफी चर्चा में है। यह फिल्म तमिलनाडु में पैडमैन के नाम से मशहूर अरुणाचालम मुरुगनाथम के जीवन पर बनी है। मगर, यहां मुरुगनाथम का आइडिया 2 साल पहले से ही चल रहा है। उन्हीं के आइडिया ने झज्जर की कुछ महिलाओं को प्रेरित किया और वह जिले 35 गांवों में महिलाओं के लिए सस्ते सेनेटरी पैड बेच रही हैं। सखी नाम से पैड बनाती है महिलाएं...

- जिले के मातनहेल ब्लाॅक की 7 महिलाएं जो खुद गंदे कपड़े की वजह से संक्रमण का शिकार हुई थीं।

- उन्होंने मुरुगनाथम की तरह ही सस्ते सेनेटरी पैड की डोर टू डोर सप्लाई शुरू की। पैड ब्रांड का नाम उन्होंने सखी रखा है।

- अहम यह है कि ये महिला ग्रुप मुरुगनाथम की इजाद की गई मशीन से ही बायोडिग्रेबिल पैड बना रही हैं।

- इस महिला ग्रुप का संचालन सुमित्रा कर रही हैं। इसमें सुनीता, सरला, शर्मिला, प्रियंका,रीना व प्रेमा भी जुड़ी हैं।

- मातनहेल में सेनेटरी पैड बना रही महिलाओं को एक पैड बनाने में लगभग 3 रुपए का खर्चा आता है। इसके 6 पैड का सेट वो महज 20 रुपए में बेचती हैं।

- ये पैड बिकवाने में आजीविका मिशन मदद करता है। ये महिला ग्रुप रोजाना 500 से 600 की संख्या में सखी नाम से पैड बना लेती हैं और बिना मार्केटिंग के ही इन गांवों में ही ये सप्लाई हो जाता है।

मुरुगनाथम की कहानी देखी, ओडिशा में लिया ट्रेनिंग

साल 2016 में मैंने तमिलनाडु के अरुणाचालम मुरुगनाथम की कहानी सुनी, कि किस तरह उन्होंने एक आम व गरीब महिला के बारे में सोचकर और उन्हें संक्रमण व बीमारी से बचाने के लिए न सिर्फ सस्ते पैड बनाए बल्कि अन्य महिलाओं को भी ये पैड बनाकर बेचने के लिए प्रेरित किया।

- इसके बाद मैं एक संगठन आजीविका मिशन से जुड़ी। इस बीच कुछ ऐसी महिलाओं से मुलाकात हुई जो सेनेटरी पैड की जगह गंदे कॉटन कपड़े का इस्तेमाल करती थीं। इससे उन्हें इन्फेक्शन हो रहा था। हमने ऐसी महिलाओं को जोड़ना शुरू कर दिया। धीरे-धीरे महिलाएं जुड़ती गईं, अब हम 35 गांवों में डोर टू डोर सेनेटरी पैड की सप्लाई दे रहे हैं।

- इस संगठन से जुड़ी सुनीता बताती हैं कि वो खुद गंदी कॉटन व कपड़े का इस्तेमाल करती थीं। दरअसल घर में यही परंपरा शुरू से थी बाहर जाकर महंगे कीमती पैड खरीदने में संकोच होता था।

- इससे इनफेक्शन हो गया, काफी इलाज के बाद राहत मिली। इसके बाद इस संगठन से जुड़कर न सिर्फ खुद को मजबूत किया बल्कि ग्रुप की महिलाओं के साथ सस्ते सेनेटरी पैड बनाकर गांव-गांव में महिलाओं, युवतियों और किशोरियों को जागरूक भी कर रही हूं।

4 लाख की मशीन की गई डोनेट

- झज्जर आजीविका मिशन के जिला समन्वयक योगेश पाराशर बताते हैं कि मातनहेल की महिलाएं रूढ़िवादी परंपरा को छोड़ पैड बनाने के लिए तैयार हुईं तब सीएसआर के तहत जेके लक्ष्मी सीमेंट की राशि सक्सेना ने इन महिलाओं को उड़ीसा में सेनेटरी पैड बनाने का प्रशिक्षण लेने भेजा।

- इसके बाद चार लाख की मशीन भी दी। जिसे पैडमैन मुरुगनाथम ने ही इजाद किया था। बाद में मुरुगनाथम की टीम का ही एक इंजीनियर तमिलनाडु से इस मशीन को लगाने मातनहेल आया था।

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