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सड़क पर भटक रहे लावारिस बेजुबानों की सेवा में जुटे मलिक 11 साल से घायल जानवरों का संस्था में करा रहे निशुल्क इलाज

इंसान के सबसे बेहतर और सच्चे दोस्त के तौर पर जानवर को माना जाता है। ये इंसान के ऐसे सहमत दोस्त होते हैं जो न कभी सवाल...

Bhaskar News Network | Last Modified - Apr 02, 2018, 03:50 AM IST

सड़क पर भटक रहे लावारिस बेजुबानों की सेवा में जुटे मलिक 11 साल से घायल जानवरों का संस्था में करा रहे निशुल्क इलाज
इंसान के सबसे बेहतर और सच्चे दोस्त के तौर पर जानवर को माना जाता है। ये इंसान के ऐसे सहमत दोस्त होते हैं जो न कभी सवाल पूछते और न ही कभी आलोचना करते हैं। आज के जमाने में जहां इंसान दूसरे इंसान का बैरी है वहीं कुछ लोगों ने इन बेसहारा जीवों की जिंदगी बेहतर बनाने की समाज में अलख जगा रहे हैं। आपको अपने आसपास ऐसे कई जानवर घूमते मिल जाएंगे जो जख्मी होते हैं या किसी बीमारी से वो तड़प रहे होते हैं। शहर के दो लोगों को भी ऐसे जानवर अक्सर नजर आते थे। उनके दिल में इन पशुओं के लिए टीस उभरी तो उन्होंने इनकी संभाल का बीड़ा उठाते हुए उपचार उपलब्ध कराना शुरू किया। ऐसे ही सड़कों, गलियों में घूमते लावारिस पीड़ित पशुओं को फिर से स्वस्थ करने को अपनी जिंदगी का मिशन बना चुके दो समाजसेवियों की कहानी हम आपके साथ साझा कर रहे हैं ताकि अन्य को भी इस मिशन में खुद को साबित करने को आगे आए।

1400 रुपए से शुरू की संस्था, अब तक हजारों जानवरों का कर चुके इलाज

वीएलडीए रह चुके बलजीत मलिक ने एक हादसे के दौरान जानवरों को होने वाले दर्द के बारे में समझा। खुद के दर्द और उस बेजुबान के दर्द में कोई अंतर ना पा उन्होंने ठाना कि लावारिस जीवों को उपचार दे स्वस्थ करेंगे। महज 1400 रुपए से उन्होंने अपनी संस्था की शुरूआत की। बलजीत मलिक ने बताया कि संस्था शुरू करने से पहले वो गांव-कॉलोनियों में पशुओं का उपचार करने जाया करते। एक साल ऐसा करने पर जब पशुओं की संख्या बढ़ने लगी तो उन्होंने सभी के इलाज को एक ही छत के नीचे करने की सोची। भरत कॉलोनी के समीप एक खाली प्लॉट लेकर पशुओं को रखा। उनके साथ इस काम में 13 और बुजुर्ग लोगों ने मदद ली। उन्होंने बताया शुरूआत में संसाधन ज्यादा न होने के कारण हमने खुद ही सब काम किए। घायल पशुओं को उस समय रेहड़ी में लाते थे। साल 2007 में शुरू हुई इस संस्था ने आज बड़ा रुप ले लिया है। आज संस्था की पांच ब्रांच हैं। इसमें गाय के साथ कुत्ते, बिल्ली, बंदर, कबूतर, मोर आदि शामिल है। इस संस्था में नजदीकी गांव, शहरों के अलावा कुरुक्षेत्र, करनाल आदि दूर क्षेत्रों से भी पशु, पक्षी आते रहते हैं।

रोहतक . पशु सेवा संघ परिसर में बीमार श्वान की जांच करते वैटनरी डाॅक्टर।

लेट सैलरी मिलने पर भी खुशी से करते हैं काम:डॉ. रविंद्र ने बताया कि चूंकि संस्था बहुत बड़ी है। पशुओं पर होने वाले खर्चे की भी रकम ज्यादा होती है। कई बार ऐसा होता है कि इनकी देख रेख में पैसे कम पड़ जाते हैं। पशुओं के इलाज में कोई व्यवधान न आए, इसलिए हम डॉक्टर्स अपनी सैलरी थोड़ा लेट कर देते हैं।

ट्रैक्टर से कटे कछुए का 3 महीने इलाज कर किया ठीक

संस्था में बतौर वेटेरनरी सर्जन कार्यरत डॉ. रवींद्र ने बताया कि उनके पास बुरे से बुरे हालातों में पशु, पक्षी आए हैं जिन्हें ठीक कर वापस उनकी जगह पहुंचाया गया है। हाल ही में, एक खेत में ट्रैक्टर के नीचे कटने से घायल कछुए को लाया गया। उन्होंने बताया कछुए काे लगी चोट से उसकी ढाल की ऊपरी सैल खराब हो गई थी। करीब तीन महीने इलाज चलने पर अब कछुए ने रिकवरी कर ली है। इसी के साथ संस्था में कुत्तों द्वारा घायल हुए मोर का भी इलाज कर स्वस्थ कर दिया गया है। उन्होंने बताया कि संस्था में पिछले साल करीब 30 जंगली जीवों को भी इलाज किया गया है।

मूक धन की सेवा के लिए हर माह खर्च देते हैं सारी पेंशन राशि

डॉ. ओमप्रकाश राणा, रिटायर्ड वेटरनरी सर्जन

मेरे पास जो भी आज संपत्ति है, घर, गाड़ी सब मूकधनों की ही बदौलत है। पशु पक्षी बेशक बेजुबान हो लेकिन इनकी दुआएं इंसान की जिंदगी को बेहद खुशहाल बना देती है। बुरी बात ये है कि इंसान को चोट लगने पर संभालने वाला जरूर मिल जाएगा लेकिन इनकी सुध लेने वाले शायद ही मिले। 2011 में बतौर वेटरनरी सर्जन पद से मेरी रिटायरमेंट के बाद मैंने ये ठाना कि जबतक जिंदा हूं मूकधनों की सेवा के लिए काम करूंगा। इस सोच के साथ मैंने साल 2012 में सीताराम पशु पक्षी सेवा ट्रस्ट की शुरूआत की। पेंशन में मुझे जो कुछ मिलता है, वो इन्हीं की सेवा में अर्पण कर देता हूं। अस्पताल के साथ साधन की व्यवस्था कर हमने फ्री में एंबुलेंस सेवाएं प्रदान करनी शुरू की। कहीं भी अगर किसी पशु-पक्षी के घायल होने की खबर मिलते ही एंबुलेंस भेज दी जाती है। अपने साथ इस सेवा कार्य में चार लोगों को ओर शामिल किया।

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