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बदलाव के लिए समाज से कटे नहीं उसे साथ लाएं

आज के जमाने के तथाकथित फेमिनिस्ट्स पाश्चात्य विचारधारा से उपजे नारीवाद को लेकर विमर्श करते हैं, जो कि भारत की...

Bhaskar News Network | Last Modified - Apr 17, 2018, 03:25 AM IST

बदलाव के लिए समाज से कटे नहीं उसे साथ लाएं
आज के जमाने के तथाकथित फेमिनिस्ट्स पाश्चात्य विचारधारा से उपजे नारीवाद को लेकर विमर्श करते हैं, जो कि भारत की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि और सामाजिक-सांस्कृतिक माटी के अनुकूल नहीं है।

भारतीय समाज में नारी की स्थिति में बदलाव लाने के लिए समाज से कटकर नहीं, समाज को साथ लेकर सामाजिक बदलाव लाया जा सकता है। ये कहना है प्रतिष्ठित पत्रकार, सोशल एक्टिविस्ट प्रो.मधु पूर्णिमा किश्वर का। सोमवार को एमडीयू के इंग्लिश डिपार्टमेंट में एक दिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी का आयोजन किया गया। संगोष्ठी का विषय ट्रांसफॉर्मिंग नैरेटिव्स: वुमेन, लॉ, एजेंसी रहा। उन्होंने कहा कि महज नारेबाजी से बदलाव नहीं आ सकता। जरूरत है कि सामाजिक यथार्थ की धरती पर ठोस काम किया जाए। दहेज कानून की विसंगतियों तथा खाप-पंचायतों पर सुनियोजित ढंग से किए जा रहे प्रचार की सच्चाई की बात उन्होंने इसमें रखी। दिल्ली विश्वविद्यालय के विधि संकाय की एसोसिएट प्रोफेसर डॉ. रजनी अब्बी ने अपने वक्तव्य में कहा कि कि लैंगिक समानता के संस्कार घर-परिवार से ही दिए जाने की जरूरत है। उन्होंने भारतीय फिल्मों में महिलाओं के चित्रण के मामले में प्रतिमान बदलाव की बात कही। उन्होंने कहा कि- तू चीज बड़ी है मस्त-मस्त तथा मैं हूं तंदूरी मुर्गा गटका लो अल्कोहल से सरीखे फिल्मी गीत महिलाओं के प्रति अपमानजनक हैं। इस तरह के गीतों पर प्रतिबंध लगाना चाहिए।

रोहतक . संगोष्ठी में अपने विचार रखतीं प्रो. मधु पूर्णिमा।

मुस्लिम समुदाय के लिए कानून में वैधानिक सुधारों की जरूरत

दिल्ली विवि की डॉ. किरण गुप्ता ने ट्रिपल तलाक मामले के कानूनी पहलुओं बारे व्याख्यान दिया। उन्होंने कहा कि भारत बहु-सांस्कृतिक, बहु-धर्मी देश है। भारत में मुस्लिम समुदाय पर निजी कानून इस्लामिक कानून के अनुसार लागू हैं। उन्होंने कहा कि बहुत से देशों में इस्लामिक निजी कानून में सुधार हुए हैं, परंतु भारत में इस कानून में वैधानिक सुधारों की जरूरत है। इस अवसर पर अंग्रेजी और विदेशी भाषा विभाग की अध्यक्षा प्रो. पूनम दत्ता ने कहा कि साहित्य का अस्तित्व अलगाव में नहीं होता। साहित्य पर सामाजिक पर्याय एवं अन्य विषयों का प्रभाव होता है। इस कार्यक्रम की अध्यक्षता डीन स्टूडेंट वेल्फेयर प्रो. राजकुमार ने की। प्रो. इस अवसर पर मानविकी संकाय के अधिष्ठाता प्रो. सुरेन्द्र कुमार, अंग्रेजी विभाग के प्रोफेसर डा. जेएस हुड्डा, प्रो. लवलीन मोहन, प्रो. रणदीप राणा, प्रो. गुलाब सिंह, प्रो. मंजीत राठी समेत अन्य प्राध्यापकगण आिद मौजूद रहे।

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