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स्कूल संचालकों का फरमान, आरक्षित सीट पर दाखिला लेने वाले बच्चों को देने होंगे 30 हजार

पानीपत में 0476, रोहतक में 0869, अंबाला 0896 अन्य जिलों में 300 से 700 विद्यार्थी शामिल है। एसेसमेंट टेस्ट में 55 % अंक...

Dainik Bhaskar

Mar 16, 2018, 04:45 AM IST

पानीपत में 0476,

रोहतक में 0869,

अंबाला 0896

अन्य जिलों में 300 से 700 विद्यार्थी शामिल है।

एसेसमेंट टेस्ट में 55 % अंक की अनिवार्यता से अभिभावकों के लिए आसान नहीं होगा प्राइवेट स्कूलों में दाखिला दिला पाना

नियमानुसार एक बार प्रवेश देने के बाद 12वीं कक्षा तक आरक्षित सीट पर ही दाखिला लिए बच्चों को करानी होगी पढ़ाई

भास्कर न्यूज | रोहतक

वर्ष 2017 में नियम 134 ए व शिक्षा का अधिकार के तहत दाखिला पाए विद्यार्थियों के लिए नए सेशन में नई मुसीबत खड़ी हो गई है। स्कूल संचालकों का कहना है कि उनका पिछले सेशन की फीस का भुगतान सरकार ने अभी तक नहीं किया है। उन पर बोझ बढ़ रहा है तो वो नए सेशन में पूरी फीस विद्यार्थियों से ही वसूलेंगे। कई स्कूलों ने तो अभिभावकों को ये फीस एकमुश्त जमा कराने का फरमान सुनाया है। इससे अभिभावक दबाव में हैं। आर्थिक रूप से कमजोर परिवार के मुखिया एकमुश्त राशि भरने में खुद को लाचार बता रहे हैं। इस पर उन्होंने अपने बच्चों को दूसरे स्कूलों में नए सिरे से 134ए के तहत दाखिला दिलाने की तैयारी कर रहे हैं। 15 अप्रैल को होने वाले एसेसमेंट टेस्ट में 55 फीसदी अंक लाने की अनिवार्यता होने से बच्चे को प्राइवेट स्कूल में दाखिला मिल पाने की राह मुश्किल होगी। अभिभावकों के आगे अब परेशानी यह होगी कि वे प्राइवेट स्कूल में बच्चे को पढ़ाई कैसे कराएं। गत सत्र 2017-18 में रोहतक जिले में 2427 आवेदन आए थे, जिसमें एसेसमेंट टेस्ट में 55 फीसदी अंक लाने वाले 869 विद्यार्थियों को ही प्राइवेट स्कूल में दाखिला मिल पाया था। सत्र 2017-18 में नियम 134 ए के तहत रोहतक जिले में 2145 सीटों के लिए सांपला ब्लॉक में 347, कलानौर ब्लॉक में 568, रोहतक ब्लॉक में 1487, लाखनमाजरा ब्लॉक में 13, महम ब्लॉक में 153 ऑफलाइन आवेदन आए थे। जबकि 289 आवेदन ही ऑनलाइन आवेदन ही जिला मौलिक शिक्षा कार्यालय को मिले। एसेसमेंट टेस्ट में 2427 बच्चों ने उपस्थिति दर्ज कराई थी।हरियाणा प्राइवेट स्कूल संघ के जिला प्रधान रविंद्र नांदल ने कहा कि सत्र 2017-18 में नियम 134-ए के तहत प्रदेशभर के निजी स्कूलों में करीब 17,320 विद्यार्थियों को दाखिला दिया गया था। विभाग की ओर से प्राइमरी विंग के प्रत्येक बच्चों की फीस 200 रुपए, मिडिल कक्षाओं की 500 रुपए फीस दिए जाने को कहा गया था। यदि औसत 400 रुपए फीस का लगाया जाए तो सरकार पर 8 करोड़ रुपए फीस बकाया है। सरकार जब तक स्कूल संचालकों को बकाया राशि का भुगतान नहीं करती है। तब तक स्कूल संचालक नियम 134 ए के तहत दाखिले नहीं देंगे। हम जल्द ही मीटिंग बुलाकर अंतिम फैसला लेंगे।

55 फीसदी अंक की अनिवार्यता खत्म कराने की आवाज उठाएंगे

दो जमा पांच मुद्दे जन आंदोलन संगठन के अध्यक्ष व एडवोकेट सत्यवीर सिंह हुड्डा ने बताया कि नया सत्र शुरू होने से पहले प्राइवेट स्कूल संचालकों ने अभिभावकों पर मोटी फीस भरने का दबाव बनाना शुरू कर दिया है। आर्थिक रूप से कमजोर परिवार के मुखियाओं ने इस समस्या से अवगत कराया है। हम जल्द ही इस मनमर्जी और 55 फीसदी अंक की अनिवार्यता खत्म कराने की मांग को लेकर लड़ाई लड़ेेंगे।

प्राइवेट स्कूलों से रिक्त सीटों

का मांगा है ब्योरा

गत सत्र नोडल अधिकारी रहे प्रिंसिपल सुरेंद्र सिंह हुड्डा ने बताया कि 20 मार्च से आवेदन लिए जाने की प्रक्रिया शुरू होगी। इससे पहले ही प्राइवेट स्कूलों से कक्षावार रिक्त सीटों का ब्यौरा मांग लिया गया है। जल्द स्कूल संचालकों की ओर से जानकारी दिए जाने की उम्मीद है। ब्लॉकवार स्कूल संचालकों को ब्यौरा देना है और स्कूलों के नोटिस बोर्ड पर भी रिक्त सीटों का नोटिस चस्पा करना है। यदि अभिभावकों को दिक्कत होती है तो वे उच्चाधिकारियों को शिकायत भेज सकते हैं।

सत्र 2017-18 में नियम

134-ए के तहत हुए प्रवेश

केस एक

रोहतक के तेज काॅलोनी निवासी यास्मीन ने बताया कि मेरा बेटा एक प्राइवेट स्कूल में पढ़ रहा है। हमने गत सत्र में बच्चे को आरटीई के तहत आरक्षित सीट पर प्रवेश दिलाया था। आरोप है कि पूरे साल स्कूल संचालक 16 सौ रुपए तक फीस लेते रहे। अब नए सत्र में हमें 30 हजार रुपए फीस भरने का फरमान सुना दिया गया है। हम लोग मेहनत मजदूरी कर किसी तरह गुजर बसर कर रहे हैं। इतनी बड़ी एकमुश्त रकम कहां से लाएंगे।

केस दो

सोनीपत जिला निवासी राकेश ने बताया कि हमने 134 ए के तहत दो बेटे संदीप व समीर को एक प्राइवेट स्कूल में प्रवेश दिलाया था। स्कूल प्रबंधन की डिमांड पर दो साल से न्यूनतम फीस का भुगतान भी करते आ रहे हैं। अब नए सत्र से 25 से 30 हजार रुपए तक एकमुश्त राशि का भुगतान करने को कहा गया है। इस बाबत हमने स्थानीय शिक्षा अधिकारियों को भी अवगत कराया। लेकिन कोई सुनवाई नहीं हुई। बार बार स्कूल बदलवाने से बच्चों की पढ़ाई प्रभावित होगी। इसका जिम्मेदार कौन होगा।
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