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पहले दिन नमाजियों ने खुदा का शुक्र फरमाया और मस्जिद में पढ़ी नमाज

रमजान का चांद देखने के साथ ही इबादतों का महीना शुरू हो गया है। गुरुवार से रोजा शुरू हो गया। पिछले साल 28 मई से रोजा...

Danik Bhaskar | May 18, 2018, 04:15 AM IST
रमजान का चांद देखने के साथ ही इबादतों का महीना शुरू हो गया है। गुरुवार से रोजा शुरू हो गया। पिछले साल 28 मई से रोजा शुरू हुआ था। पहला रोजा का इफ्तार 7:07 बजे और सहरी 4:00 बजे होगा। धीरे-धीरे समय एक-दो मिनट बढ़ते हुए अंतिम रोजा 14 जून को 7:21 बजे इफ्तार और 3:48 बजे सहरी होगा। इस बार माह-ए-रमजान में पांच जुमा पड़ेगा।

पहला जुमा 18 मई को पड़ेगा। दूसरा जुमा 25 मई, तीसरा एक जून, चौथा 8 जून को पड़ेगा। रमजान के अंतिम सप्ताह में चांद नहीं दिखा तो पांचवां जुम्मा 15 जून को पड़ने की संभावना है। शुक्रवार को 7:08 बजे इफ्तार और 3:59 बजे सहरी का समय रहेगा। ईदगाह कॉलोनी स्थित मदरसा के प्राचार्य और मस्जिद के इमाम मोहम्मद इमरान नदवी ने बताया कि रमजान चूंकि इबादतों का महीना है और अल्लाह पाक हर नेकी का सवाब सत्तर गुना बढ़ा कर देता है, इसलिए सब ज्यादा से ज्यादा नेकियां कमाने की कोशिश में लग जाते हैं। इस बीच घर-परिवार और कारोबार की मशरूफियत अपनी जगह होती है।

रमजान के रोजे के साथ-साथ तरावीह की नमाज का खास महत्व होता है। यह नमाज रात्रि साढ़े आठ बजे के करीब शुरू हो जाती है। रमजान के पूरे महीने में रोजे के साथ-साथ तरावीह की नमाज पढ़ना भी जरूरी है। इसमें एक हाफिज-ए-कुरआन (जिनको पूरा कुरआन कंठस्थ होता है) प्रति दिन कुरआन के एक पारा (अध्याय) की तिलावत (पाठ) करते हैं। आम तौर पर प्रति दिन एक-एक पारा खत्म कर तीस दिनों में पूरा तिलावत-ए-कुरआन मुकम्मल कर लिया जाता है।


रमजान का पाक महीना शुरू

सामाजिक बराबरी का पैगाम देता है रमजान

रोजे का न केवल धार्मिक महत्व है, बल्कि इसका सामाजिक और आर्थिक महत्व भी है। वैज्ञानिक दृष्टिकोण से भी यह शरीर के लिए फायदेमंद है। डॉक्टरों के अनुसार इस संयमित उपवास से पाचनतंत्र दुरुस्त हो जाता है। धार्मिक पक्ष यह है कि रमजान के महीने भर की कठिन साधना से इंसान अल्लाह का नेक और फरमाबरदार (आज्ञाकारी) बंदा बनने की कसौटी पर खरा उतर सकता है। इस्लाम के पांच फर्जों में से रोजा एक है।

रमजान के पूरे महीने में रोजा उपवास रखना

इस महीने का कोई भी अमल यूं ही नहीं है। हर अमल में खास संदेश छुपा है। रमजान के पूरे महीने में रोजा यानी उपवास रखने का सामाजिक पक्ष यह है कि खुद को भूखे-प्यासे रखने से हमें गरीबों की भूख का एहसास होगा। हम जब भूख और प्यास की शिद्दत को अपने-आप पर महसूस करेंगे तो हमारे अंदर गरीब-बेसहारों की मदद का जज्बा जगेगा। रमजान समाजवाद की जबर्दस्त हिमायत करता है।

रमजान के महीने को 3 अशरों में बांटा गया

रमजान के महीने को तीन अशरों (अवधियों) में बांटा गया है। पहली 10 दिनों की अवधि रहमत की कहलाती है, यानी शुरू के 10 दिनों में बंदों पर खुदा की रहमत बरसती है। 10 दिनों का दूसरा अशरा मगफिरत का होता है। इसमें नेक बंदा अपने गुनाहों की जो भी माफी मांगता है, उसे अल्लाह कबूल फरमाते हैं। आखिरी अशरा निजात यानी जहन्नुम से छुटकारे का होता है। इस तरह देखा जाए तो रमजान का पूरा महीना अल्लाह की रहमतों से भरा है।