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उनमें संतों जैसे करुणा भाव थे लेकिन नियम पालन में कठोरता भी थी: ज्ञानानंद महाराज

Ambala News - भास्कर विशेष ज्ञानानंद महाराज से लायलपुर (पाकिस्तान) के प्रकाश देव के अम्बाला में वीरजी और फिर गीतानंद...

Jan 16, 2020, 07:20 AM IST
Ambala News - haryana news he had compassion like saints but there was also rigor in following rules gyananand maharaj
भास्कर विशेष

ज्ञानानंद महाराज से

लायलपुर (पाकिस्तान) के प्रकाश देव के अम्बाला में वीरजी और फिर गीतानंद बनने की कहानी...

गुरु के बारे में जानिए उनके शिष्य

स्वामी ज्ञानानंद महाराज

बचपन की घटनाएं जिनसे वैराग्य के संदेश


प्रकाश देव लगभग 7-8 वर्ष के थे। एक दिन वे पड़ोस के बच्चों के साथ खेल रहे थे तो एक बच्चे की टॉफी पर उनकी नजर पड़ी तो टॉफी छीनकर भाग गए। प्रकाश की मां यह देख रहीं थी। अभी वो टॉफी खाने ही वाले थे कि मां ने बेटे का हाथ पकड़ लिया और एक थप्पड़ के साथ नसीहत दी। इस घटना से उन्हें लालच ना करने की सीख मिली। घर के कोने में बैठे बार-बार पूरे प्रकरण को सोचते रहे कि अगर उसके पास अपने घर में ही सबकुछ है तो क्यों उन्होंने यह गलती की।


गीतानंद उर्फ प्रकाश परिवार में छह बड़ी बहनों से सबसे छोटे थे। लाड प्यार के कारण कोई उन्हें निक्का, मंगा और काका कहकर बुलाता था। तब वे यह सोचते थे कि एक व्यक्ति को कितने नामों से संबोधित कर सकते हैं। ऐसे ही भगवान के नाम भले ही कितने हों, वह एक ही है।


उनके पिता घर में हमेशा कहते थे-अगर किसी को घर में रहता है तो नियमों का पालन करना होगा। इनमें घर के कामों में समान रूप से शामिल होना, अनुशासन, बड़ों के प्रति सम्मान, जल्दी उठना और सूर्योदय से पहले स्नान करना और नाश्ते के लिए बैठने से पहले श्रीमद् भगवद गीता का पाठ करना शामिल था। इसकी मन पर छाप पड़ी कि पूरा जीवन नियमों पर चले।


अकसर मां को दही जमाते देखते थे। मां दूध को बरतन में डालकर गर्म स्थान पर सेट करने के लिए छोड़ देती थी। परिवार में हर किसी को हिदायत थी कि अब इस बरतन को छूना या स्थानांतरित नहीं करना। मां कहती थी, यदि अच्छी दही का स्वाद लेना चाहते हैं, तो बरतन को हिलाए नहीं। यह बात उन्होंने गांठ बांध ली। जब वे सन्यासी जीवन में आएं तो कुटिया में आने वालों से यही कहते थे कि अपने विश्वास को हिलने मत दो।


12 साल की उम्र में प्रकाश ने बड़ी बहन की शादी देखी। पूरा परिवार में उत्साहित था। शादी के दिन प्रकाश को समझ आया कि बहन अब अपने परिवार के साथ नहीं रह पाएगी और कभी-कभार आएगी। मां-बाप से पूछा तो जवाब मिला एक दिन हर लड़की को दूसरे घर जाना होता है। इस पर प्रकाश यह कहते हुए भागा कि अगर बहन को छोड़ना है तो परिवार को पहले ही उसके साथ अतिथि जैसा व्यवहार करना चाहिए था। इसके बाद वह किसी बहन के विवाह समारोह में शामिल नहीं हुए। सन्यास के बाद भी कहते हैं कि शरीर में आत्मा अतिथि है।


1952-53 में एक दिन काकरू के पास पंज पीरों के पास पेड़ के नीचे साधना कर रहे थे। मन में ईश्वर दर्शन की तीव्र इच्छा हुई। तो पटरियों के पास डट गए कि या दर्शन होंगे या शरीर त्यागेंगे। बताते हैं तभी मन में गीता धारी कृष्ण के स्वरूप दिखा। उसके बाद जयपुर से कारीगर को बुलवाकर वैसे ही गीता धारी भगवान कृष्ण की की प्रतिमा बनवाई। जो आज भी कुटिया में है।

-जैसा श्री गीता सत्संग ट्रस्ट के अध्यक्ष डॉ. महेश मनोचा व वीरजी के सेवादार रहे बलदेव ने भास्कर को बताया

गीता नगरी के जिस स्थान स्थान पर सत्संग भवन है, वहां कभी इस तरह कुटिया में रहते थे गीतानंद (दाएं)।

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