जयचंद्र तो सिर्फ मोहरा, मुनाफाखोरी के खेल में बड़े खिलाड़ी

Ambala News - प्रगति विहार में बगैर लाइसेंस के बोतलों में सेनिटाइजर फिलिंग का जो गोरखधंधा पकड़ा गया, उसमें जयचंद्र तो सिर्फ...

Mar 22, 2020, 07:15 AM IST

प्रगति विहार में बगैर लाइसेंस के बोतलों में सेनिटाइजर फिलिंग का जो गोरखधंधा पकड़ा गया, उसमें जयचंद्र तो सिर्फ मोहरा है। इसके पीछे बड़े लोगों के हाथ, दिमाग और चेहरे हैं, जो अभी सामने आने बाकी हैं। अब इस मामले में फूड एंड ड्रग एडमिनिस्ट्रेशन (एफडीए) के कमिश्नर, स्टेट ड्रग कंट्रोलर, जिला आयुर्वेद अधिकारी और पुलिस के स्तर पर विभिन्न तथ्यों की जांच चल रही है।

अभी तक इस मामले में एक्सा फार्मास्युटिकल नाम से शाहाबाद में दुकान चलाने वाले बिस्मिल देव सिंह, डिफेंस कॉलोनी में आयुर्वेदिक लाइसेंस होल्डर मैजिक ऑफ हर्ब्स की भूमिका जांच के दायरे में है। क्योंकि प्रगति विहार में जो सेनिटाइजर की बोतलें मिलीं, उन पर एक्सा ब्रांड का नाम लिखा था। बोतलों पर मैन्युफेक्चर्ड बाय-मैजिक ऑफ हर्ब्स और मार्केटिंग बाय-एक्सा लिखा था। बोतलों पर बेन फार्मास्युटिकल का लाइसेंस नंबर लिखा था। बेन फार्मास्युटिकल के पास सेनिटाइजर बनाने का लाइसेंस नहीं है। बेन के एमडी योगेश मिड्ढा की ही शिकायत पर यह केस दर्ज हुआ है।

यूं जुड़े एक-दूसरे के तार; जयचंद्र ढाई साल बेन फार्मा में काम कर चुका, बिस्मिल मैजिक ऑफ हर्ब्स से सप्लाई लेता है, बिस्मिल और जयचंद्र की मुलाकात गौरी लैब में हुई थी

कोरोना वायरस के कारण सेनिटाइजर की डिमांड बढ़ने से काला बाजारी बढ़ी तब मुनाफे के चक्कर में यह धंधा प्लान हुआ। होलसेल दवा विक्रेता बिस्मिल देव सिंह की काफी पहले गौरी लैब में काम करने वाले जयचंद्र से जान पहचान हुई थी। बिस्मिल ने साइंस मार्केट से साढ़े 6 हजार रुपए में फिलिंग मशीन खरीदकर जयचंद्र को दी। उसके बाद डिफेंस कॉलोनी के आयुर्वेदिक लाइसेंस होल्डर मैजिक ऑफ हर्ब्स से 200 लीटर इथाइल अल्कोहल वाला रेडीमेड सॉल्यूशन खरीदा (इसकी बिलिंग बिस्मिल के नाम है)। पिछले हफ्ते मशीन से बोतलों में यह सॉल्यूशन फिलिंग करके एक्सा का लेबल चिपका सेनिटाइजर के नाम से बेचने का धंधा शुरू हो गया। हालांकि इलेक्ट्रिकल मशीन कामयाब नहीं हुई तो हाथ से चलने वाली फिलिंग मशीन इस्तेमाल होने लगी। एक बोतल की फिलिंग व लेबल चिपकाने के जयचंद्र को 2 रुपए मिलते थे। जयचंद्र 2,500 बोतलें फिलिंग करके बिस्मिल को दे चुका था। मेन्यूफेक्चरर व ड्रग लाइसेंस का नंबर लिखना जरूरी होता है, ताकि सेनिटाइजर असली दिखे, इसलिए बेन फार्मा के लाइसेंस नंबर का इस्तेमाल कर लिया गया। जयचंद्र करीब ढाई साल बेन फार्मा में काम कर चुका था। सेनिटाइजर के प्रचार के लिए वाट्सएप ग्रुप में डाला गया तो ड्रग कंट्रोल डिपार्टमेंट के कान खड़े हुए। सबसे पहले बेन फार्मा के एमडी योगेश चड्ढा से बात हुई। उन्होंने अपना लाइसेंस नंबर गलत तरीके से इस्तेमाल होने की शिकायत दी। फिर मैजिक ऑफ हर्ब्स पर रेड की। वहां से बिस्मिल देव का पता चला और आखिर में प्रगति विहार में जयचंद्र पकड़ गया।



नकली सेनिटाइजर बनाकर क्यों आम आदमी के भरोसे को खतरे में डाल रहे?

-प्रगति विहार में एक ही सॉल्यूशन से अलग-अलग साइज की बोतलों में फिलिंग हो रही थी। 60 एमएल की बोतल पर 75 फीसदी अल्कोहल प्रिंट था जबकि 200 एमएल की बोतल पर 72.34 फीसदी अल्कोहल प्रिंट था। अब असल में इस सॉल्यूशन में क्या कंबिनेशन थे, यह जानने के लिए चंडीगढ़ की लैब में सैंपल भेजे गए हैं। रिपोर्ट आने में कम से कम एक महीना लगेगा। कई बार सेनिटाइजर के नाम पर ग्लिसरिन का कंबिनेशन भी बेच दिया जाता है। वैसे सेनिटाइजर में कम से कम 60 फीसदी अल्कोहल जरूरी होता है।

इन सवालों से समझें गड़बड़ कहां

{ मैजिक ऑफ हर्ब्स के पास आयुर्वेदिक मैन्युफेक्चरिंग का लाइसेंस है। जबकि उसने बिस्मिल को इथाइल अल्कोहल वाला रेडीमेड सॉल्यूशन बेचा। इस अल्कोहल के लिए आयुर्वेदिक नहीं ड्रग लाइसेंस की जरूरत होती है। आयुर्वेदिक दवाओं में आइ सो प्रोफाइल अल्कोहल (आईपीए) इस्तेमाल हो सकता है।

जांच का सवाल- मैजिक ऑफ हर्ब्स के पास ये इथाइल अल्कोहल आया कहां से?

{ एक्सा फार्मास्यूटिकल के पास मैन्युफेक्चरिंग लाइसेंस नहीं है, इसलिए बोतल पर मैजिक ऑफ हर्ब्स की मैन्युफेक्चरिंग लिखी। जबकि ड्रग लाइसेंस नंबर बेन फार्मा का लिखा। जबकि बेन फार्मा के पास सेनिटाइजर बनाने का लाइसेंस ही नहीं है। बेन फार्मा स्पष्ट कर चुकी कि उनके लाइसेंस नंबर का इस्तेमाल बिना अनुमति व बिना जानकारी के हुआ।

जांच का सवाल-क्या बिस्मिल की मैजिक

ऑफ हर्ब्स के साथ मिलीभगत थी?

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