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हिंसा से किनारा कर बदली अपनी और दूसरों की जिंदगी, 27 साल से ब्रह्मजीत पढ़ा रहे अहिंसा का पाठ

Ambala News - अम्बाला| कभी हिंसक प्रवृत्ति के रहे ब्रह्मजीत सिंह खालसा के जीवन में एक ऐसा मोड़ आया जिससे उनकी जिंदगी बदल गई।...

Bhaskar News Network

Apr 17, 2019, 07:16 AM IST
Ambala News - haryana news the transit of violence and the life of others the lessons of non violence taught for 27 years in brahmaith
अम्बाला| कभी हिंसक प्रवृत्ति के रहे ब्रह्मजीत सिंह खालसा के जीवन में एक ऐसा मोड़ आया जिससे उनकी जिंदगी बदल गई। सड़क हादसे में पिता व चाचा की मौत का सदमा वह सह नहीं पाए इसलिए उन्होंने अपनी जिंदगी में परिवर्तन कर दिया। लोग कभी ब्रह्मजीत के नाम से कांपते थे, आज वह उनकी अहिंसावादी प्रवृत्ति को देखकर उसे अपने दिनचर्या में निभाने की काेशिश कर रहे हैं। आज वह गुरुद्वारा में सुबह शाम जहां सेवा करते हैं, वहीं जरूरतमंद बच्चों को शिक्षा दिलवाने, बुजुर्गांे की सहायता करने व अन्य सामाजिक कार्यांे में अहम भूमिका निभा रहे हैं।

बीसी बाजार गुरुद्वारा के प्रधान ब्रह्मजीत सिंह खालसा ने अपने जीवन में अहिंसा का मार्ग अपनाकर लोगों के सेवा में अपना जीवन समर्पित कर दिया है। यह बदलाव उनके अंदर 23 फरवरी 1983 में जीटी रोड पर उनके पिता व चाचा की हरियाणा रोडवेज की बस से हुई टक्कर में मौत के बाद आया। खालसा सुबह रोजाना 3 बजे उठकर दिनचर्या शुरू कर देते हैं, जिसके बाद दोनों पति-प|ी गुरुद्वारा साहिब में सेवा करने में जुट जाते हैं। इसके बाद घर पर पाठ करते हैं व शाम को दोबारा गुरुद्वारा में सेवा करते हैं। धार्मिक कार्यक्रमों की शुरुआत में खालसा का अहम योगदान रहा है। उन्होंने ही गांधी ग्राउंड में लगने वाले सालाना समागम की शुरुआत की थी जो 26 साल से जारी है। खालसा ने हिंसक प्रवृत्ति को छोड़कर 1994 में गुरुद्वारे में सेवा करना शुरू कर दिया था। इसके बाद से 70 साल की उम्र हो जाने के बाद भी उनकी दिनचर्या में बदलाव नहीं आया है।

बीसी बाजार गुरुद्वारे का किया कायाकल्प

बीसी बाजार गुरुद्वारे से जुड़े हुए ब्रह्मजीत सिंह खालसा को 27 साल हो चुके हैं। इस दौरान उन्होंने गुरुद्वारे की बिल्डिंग में सुधार के साथ-साथ सौंदर्यीकरण के भी कई कार्य किए हैं। वहीं गुरुद्वारे द्वारा लोगों की सेवा में खर्च होने वाली रकम की मदद के लिए खालसा ने गुरुद्वारे के पास बिल्डिंग का निर्माण किया है जिससे गुरुद्वारे को सालाना 25 हजार रुपए की कमाई होती है। इससे जरूरतमंद लोगों की मदद के लिए उपयोग में लाया जाता है। खालसा सभी गुरुद्वारों के प्रधान तक रह चुके हैं।


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