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खुद के संघर्ष के बाद डॉ. मीरा ने अब इकलौते बेटे को बनाया फाइटर पायलेट

एक वर्ष पहले
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दिल्ली बाइपास स्थित गवर्नमेंट आईटीआई के अकाउंट विभाग में कार्यरत डॉ. मीरा सिवाच भिवानी जिले के तोशाम तहसील के एक छोटे से गांव सरल के एक संयुक्त परिवार में 15 मई 1979 को महावीर के घर पैदा हुई। पैदा होने पर बेटा बेटी के भेद वाले समाज में पड़दादी द्वारा फेंक दी गई। माता पिता ने भी खासा ध्यान नहीं दिया। दो साल की हुई तो चाचा- मौसी को गोद दे दिया। परिवार में बंटवारा होने के बाद उनके साथ ही सरल से 15 किलोमीटर दूर रेतरां गांव में रहने लगे। कभी कबार सरल जाने पर बड़े भाई व छोटी बहन को स्कूल जाते देख पढ़ने की उत्सुकता जागी।

दादा के पीछे तीन किलोमीटर तक दौड़ते हुए स्कूल जाने की जिद्द की तो हफ्ते बाद पिता अपने साथ गांव ले आए। दादा के साथ पास के स्कूल में दाखिले के लिए गई तो शिक्षक ने नृत्य व शिक्षा के गुण को देख मीरा बाई नाम दिया। तभी से नाम भी यही दे दिया गया। प्राइवेट स्कूल में जाने वाले भाई से ज्यादा होशियार होने से हर रोज भाई की किताबें पढ़ उसे भी पढ़ाने की जिम्मेदारी ली। पढ़ाई व खेल अब मीरा का लक्ष्य बन चुका था। बड़ी बहन 18 वर्ष की हुई तो शादी के लिए रिश्ते देखने लगे। बहन की सास की नजर छोटे बेटे के साथ शादी करवाने के लिए थी। बड़ी बहन की सगाई में मजाक में ही सास द्वारा मांग भर हमारे घर की बहु बन गई कहना 13 वर्षीय मीरा को समझ नही आया। कुछ महीने बाद ही बहन के साथ ही उसके भी सात फेरे दिलवा दिए गए। शादी का मतलब भी न समझने वाली मीरा सुंदर लगने की खुशी में ही गुल थी। ससुराल जाने के बाद पग फेरे पर घर आई तो ससुर ने कन्या होने के कारण घर पर ही छोड़ दिया। स्कूल गई तो बच्चों से पता चला कि उसकी शादी हो चुकी है। वह दोबारा शादी नही होगी। घर आकर मां से पूछा तो मां भी रोने लगी। सदमे में गुम मीरा अब चुप हो गई। शिक्षकों ने पिता के फैसले पर सवाल उठाए तो पुन: अपने लक्ष्य की ओर बढ़ी। बाल विवाह करने की गलती के बाद अब पिता पढ़ाई के लिए साथ देने लगे। पढ़ने में मशरूफ होने पर पति ने एक दिन इस कदर पीटा कि चेहरे के हर अंग पर नील हो गया। बेटे निशांत को दूध पिलाते वक्त पति द्वारा फिर से हाथ उठाने का प्रयास किया तो विरोध जताया। विरोध को ससुराल वाले सहन नही कर पाए तो घर से बाहर निकाल दिया। बहन से 20 रूपये लेकर बेटे को वहीं छोड़ मामा को फोन किया। मामा के गांव से मदद लेकर ससुराल वालों को उनकी गलती का अहसास करवाया तो ससुर ने साथ देना शुरू कर दिया। परीक्षा में विश्वविद्यालय में तीसरा स्थान प्राप्त किया तो परिवार को सर गर्व से ऊंचा हो गया।

अकाउंट विभाग में कार्यरत डॉ. सिवाच ने बताया-पैदा होने पर परदादी ने फेंका तो चाचा-मौसी ने थामा हाथ, 13 वर्ष की उम्र में हुई शादी, टीचर्स ने किया सहयोग तो की 12वीं

मीरा सिवाच।

पिता से पढ़ाई के लिए 6 हजार मांगे तो कुछ समय बाद ले लिए वापस

सास से पैसे मांगने पर न मिलने से मीरा ने अपने पिता से 6 हजार रूपये अपनी पढ़ाई के लिए लिए तो पढ़ाई पुरी होने के कुछ समय बाद ही वापिस मांग लिए गए। बेटी अब सच में पराई हो गई थी। हार न मानते हुए एमकॉम की पढ़ाई भी की। पारिवारिक स्थिति ठीक होने के बाद एमबीए की व हिसार में जिंदल इंडस्ट्री में अकाउंटेंट बनी। पढ़ाई पूरी होने पर आईटीआई सिरसा में अध्यापक पद पर कार्यरत हुई तो 2010 में हिसार आईटीआई में स्थानांतरण के साथ साथ हॉस्टल वॉर्डन भी बनी। कुशलता व निर्भीकता को देख सैक्सुअल हरासमेंट कमेटी की चेयरपर्सन नियुक्त किया गया। सफलता ने इतनी हिम्मत दे दी कि इकलौते बेटे निशांत को 2017 में फाइटर पायलेट बनाने में अपना दम लगा दिया। मां के साहस की कहानी से प्रेरणा लेकर देश के लिए कर्तव्य निभाने के लिए निशांत भी पायलेट बनने की राह पर
निकल पड़े व अपना तथा मां का सपना साकार कर दिखाया। शिक्षकों ने साथ दिया तो बड़े भाई के साथ गांव से दूर तोशाम में हर रोज बस से जाने लगी। शादीशुदा होने के कारण लड़कों द्वारा उसके बारे में भाई को पत्र दिया गया। जिसमें मीरा के बारे में अभद्र टिप्पणी की गई थी।
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