जिसे ढूंढ़ता फिरे खुद खुदा, मुझे उस बशर की तलाश है...
नृत्य जब बिना तैयारी होता है तो वो ध्यान बनता है
ओशो हमेशा अपने प्रवचनों में कहते आएं है कि नृत्य जब बिना किसी तैयारी के होता है तो उसमें से एक अलग ही ऊर्जा निकलती है और तब वो ध्यान बन जाता है। कुछ ऐसा ही माहौल ओशो सूफी संंध्या में देखने को मिला, जहां हर कोई बिना किसी तैयारी के बेपरवाही से झूमता दिखाई दिया। मां सांची की गजलों में खोकर हर कोई परमात्मा को ढूंढने का प्रयास करता दिखाई दिया।
ओशो सूफी संध्या
मां सांची ने कहा कि जब हम सच्चे दिल से गाते हैं तो वो परमात्मा आ ही जाता है। ईश्वर तो यहीं आस-पास है मगर हम लोग ही उसे भूल जाते है, ये कहते ही मां सांची ने कहा कि तो चलिए मिलकर उस परमात्मा को बुलाते हैं और परमात्मा की खोज पर निकलते हैं। इसके बाद मां सांची ने आज होणा दीदार माही दा...और लाल मेरी पत रखियो बला झूले लालण सिंदड़ी दा सेवण दा सखी शाह बाज़ कलन्दर, दमादम मस्त कलन्दर अली दम दम ...जैसी कव्वाली से माहौल में रुमानियत घोली।
...तो चलिए मिलकर पुकारते हैं
सिटी रिपोर्टर } मुझे सोजो-साजे हयात की गमे मोतवर की तलाश है, जिन्हें शौके जलबाए बाम हैं उन्हें हों नसीब बुलंदियां। मेरा सर जहां से न उठ सके मुझे ऐसे दर की तलाश है, जिन्हें बिजलियों की है आरजू उन्हें शोलगी मिले बर्फ की। जिसे ढूंढता फिरे खुद खुदा मुझे उस बशर की तलाश है... मां सांची की रुमानियत भरी आवाज में गजल के सुरों के बिखरने के साथ ही हर चेहरा परमात्मा की खोज में लीन दिखा।
दरअसल, एमसी कॉलोनी स्थित जोरबा थिएटर में ओशो सूफी संध्या का आयोजन किया गया। मां सांची के साथ स्वामी संजय ने भी शिरकत की। कार्यक्रम का आयोजन जोरबा थिएटर के डायरेक्टर गुलशन भुटानी की ओर से किया गया। मंच संचालन सौरभ ठकराल ने किया। इसके साथ ही रमन नासा, अनूप बिश्नोई, डिम्पल सुंडा, लार्ड कृष्णा स्कूल के सुधीर वरमानी, स्मॉल वंडर से बीके अरोड़ा, डॉ. विवेक गुप्ता, डॉ. वीना आिद मौजूद रहे।