हमसफर / पति के काज के साथ ही खुद का जीते जी करवाया काज और अगले ही दिन चल बसीं 92 साल की जहरो देवी



बनवारी लाल और जहरो देवी। (फाइल) बनवारी लाल और जहरो देवी। (फाइल)
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बनवारी लाल और जहरो देवी। (फाइल)बनवारी लाल और जहरो देवी। (फाइल)

82 साल के हमसफर आजादी से पहले 1937 में हुई थी बनवारी लाल और जहरो देवी की शादी
 

Dainik Bhaskar

Jan 14, 2019, 11:42 AM IST

हिसार। कुम्हारान मोहल्ला निवासी जहरो देवी और बनवारी लाल 1937 में विवाह बंधन में बंधे थे। जिंदगी का 82 बरस का सफर एक साथ तय किया। चार पीढ़ियों को पलते पढ़ते देखा और आज परिवार में बेटे-बेटियों, पोते-पोतियों, परपोते व परपोतियां सहित 32 सदस्य हैं। 92 साल की जहरो देवी और 102 साल के बनवारी लाल की अंतिम विदाई भी कुछ इस तरह हुई की जाते-जाते यादगार छोड़ गए।

 

बनवारी लाल की 31 दिसंबर 2018 को मौत हो गई। बेटों ने पति का 11 जनवरी को काज किया। मां ने बेटों से कहा कि मेरा भी जीते जी काज (जीते जी रस्म पगड़ी) कर दो। बेटों ने मां की बात मानी और पिता के काज के साथ ही मां का भी जीते जी काज कर दिया। काज करने के अगले ही दिन जहरो देवी ने भी दम तोड़ दिया। 

 

जयपाल का कहना है कि दादा बनवारी ने कभी काम नहीं छोड़ा। 101 वर्ष के थे, तब तक काम करते थे। जयपाल के पिता बताते हैं कि कुरुक्षेत्र गोशाला बनने से पहले यहां ईंटें पकाते थे। इसके बाद गोशाला का निर्माण हुआ। बनवारी लाल के हाथों से तैयार हुई ईंटों से गोशाला का निर्माण हुआ था। इसके अलावा उदयपुरिया मोहल्ला में गोशाला भी पिता के हाथों से तैयार की गई ईंटों से बनाई गई है। बेटे ने बताया कि पिछले साल दिवाली पर उन्होंने दीये बनाकर बेचे थे। मां जहरो देवी घर का काम ही करती थीं।

 

प्रेम इतना कि अब तक एकसाथ बैठकर खाते थे खाना
पोते जयपाल ने बताया कि दादा-दादी का प्रेम इतना था कि एक दूसरे के बिना खाना तक नहीं खाते थे। दोनों एक दूसरे के साथ ही बैठकर खाना खाते थे। अंतिम समय तक दोनों एक दूसरे के साथ रहे। 31 दिसंबर को बनवारी लाल की मृत्यु के बाद जहरो देवी उदास रहने लगी। वैसे पूरी तरह से स्वस्थ थी। 11 जनवरी को बनवारी लाल का काज (रस्म पगड़ी) के दिन दादी ने कहा मेरी भी जीते जी रस्म पगड़ी कर दो। बेटों पोतों ने जहरो देवी की रस्म पगड़ी कर दी। अगली ही सुबह जहरो देवी ने भी प्राण त्याग दिए। 

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