हिसार / सियासतदानों के शहर में सियासत और दोनों औद्योगिक घराने खामोश



प्रतीकात्मक फोटो। प्रतीकात्मक फोटो।
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प्रतीकात्मक फोटो।प्रतीकात्मक फोटो।

  • चर्चा में सीट क्योंकि जिंदल परिवार चुनाव से दूर है

Dainik Bhaskar

Oct 11, 2019, 05:44 AM IST

हिसार में दो बड़े व्यावसायिक घरानों नवीन जिंदल और सुभाष चंद्रा परिवार का खासा प्रभाव रहा है। जहां जिंदल परिवार कांग्रेस की नुमाइंदगी करता रहा है, वहीं सुभाष चंद्रा भाजपा खेमे के हैं। इस बार गतिविधियां जोर नहीं पकड़ पाई हैं। जबकि मतदान में महज 11 दिन शेष हैं। क्या ये घराने चुनाव में सक्रिय होंगे या नहीं। -इस पर पढ़िए मनोज कुमार की रिपोर्ट


एेतिहासिक शहर हिसार में सियासी चुप्पी है। इनेलो का चुनावी कार्यालय भी शुरू नहीं हुआ। बाजारों, मंडियों और चौराहों पर चर्चा बस इतनी है कि कोई छेड़े तो दूसरा शुरू हो जाता है। न कोई झंडा और न बैनर है। यहां की चुप्पी इसलिए अहम है क्याेंकि सभी दलों के करीब 20 से ज्यादा बड़े नेता या तो हिसार में रहते हैं या फिर वे किसी ने किसी तरीके से यहां से जुड़े हैं। हिसार विधानसभा का क्षेत्र में प्रत्याशियों की हार-जीत से ज्यादा चर्चा लंबे समय तक चुनावी सक्रियता दिखाने वाले देश के दो बड़े औद्योगिक घरानों की है। जिंदल और चंद्रा परिवार। जिंदल हाउस कांग्रेस से तो चंद्रा परिवार भाजपा से राजनीति करता है।


पिछले चुनाव में पराजित होने वाली देश की सबसे अमीर महिला सावित्री जिंदल भले ही नामांकन और कार्यालय उद्धाटन पर कांग्रेसी प्रत्याशी एवं कुलदीप बिश्नोई के करीबी रामनिवास राड़ा के साथ दिखाई दी। 1996 के चुनाव को छोड़ दिया जाए तो 1991 से 2014 तक जिंदल परिवार ही हिसार से विधानसभा का चुनाव लड़ता रहा है। पहले ओपी जिंदल ने तीन चुनाव लड़े। उनके निधन के बाद एक उपचुनाव समेत उनकी पत्नी सावित्री जिंदल तीन बार चुनाव मैदान उतरीं, लगातार दो बार जीतने के बाद पिछला चुनाव मोदी लहर में वे हार गईं।
परिवार ने यहां से छह चुनाव लड़े हैं, जिनमें पांच बार हिसार के लोगों ने उन्हें झोली भरकर वोट दिए हैं। लेकिन इस बार चुनाव न लड़ने से उनके समर्थकों में मायूसी जरूर है। जबकि इधर, पिछले विधानसभा चुनाव में भाजपा प्रत्याशी कमल गुप्ता के साथ कंधे से कंधा मिलाकर हिसार की गलियों तक घूमने वाले उद्योगपति एवं राज्यसभा सदस्य सुभाष चंद्रा अभी कहीं नजर नहीं आए हैं। पिछले चुनाव में गुप्ता के समर्थन में चंद्रा में फिल्मी सितारे तक उतार दिए थे। लेकिन 2019 के इस चुनाव में ये दोनों औद्योगिक घरानों के कदम चुनाव में आगे नहीं बढ़ रहे हैं। सावित्री जिंदल के बेटे एवं पूर्व सांसद नवीन जिंदल ने भी अभी कांग्रेस के समर्थन में वोट नहीं मांगे हैं। वह लोकसभा चुनाव से भी दूर रहे थे।


बात मुद्दे की : शहर में वोटर अपनी बंद चुप्पी तोड़ने को तैयार नहीं है। व्यापारी वर्ग अभी चुप है। कुछ लोग बोले-यहां तो चेहरे और स्थानीय मुद्दे ही देखेंगे। विद्या नगर के कल्लुराम चुनावी चर्चा छेड़ते ही अपनी पीड़ा सुनाने लगे। बोले-मेरे घर में 65 वोट हैं। लेकिन पत्नी की उम्र राशन कार्ड और आधार कार्ड में गलत होने से उसकी पेंशन नहीं बनी। पत्नी का हाथ कटा हुआ है, विकलांग सर्टिफिकेट नहीं बना। इसलिए सोच रहा हूं कि वोट किसे और क्यों दूं। अनाज मंडी के पवन कहते हैं यहां कोई मुद्दा ही नहीं है। यहां तो चेहरे देखकर वोट दिए जाएंगे। यहां यह भी जान लें कि हिसार में राष्ट्रीय मुद्दों पर स्थानीय मुद्दे हावी रहेंगे। हिसार सीट पर अब तक 16 बार हुए आम और उपचुनाव में अग्रवाल समाज से ही विधायक बने हैं। जबकि दो बार पंजाबी और एक बार सैनी समुदाय के उम्मीदवार जीतकर विधानसभा तक पहुंचे हैं। इस बार भाजपा ने कमल गुप्ता पर एक बार फिर भरोसा जताया है तो कांग्रेस ने सैनी समुदाय से रामनिवास राड़ा को टिकट दी है। शहर में सबसे ज्यादा पंजाबी तो दूसरे नंबर पर अग्रवाल और तीसरे नंबर पर सैनी समुदाय के वोटर हैं।

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