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संसार रूपी नदी पार करने को संत रूपी मल्लाह की जरूरत: अम्बरीष

Hisar News - संत जीव को संसार से भागना नहीं जागना सिखाते हैं। संत इस क्षणभंगुर संसार को देखने की दृष्टि देते हैं। ये उद्गार...

Dainik Bhaskar

Dec 09, 2018, 04:11 AM IST
Hisar News - the need of a saint for the crossing of the world is like a sailor ambarish
संत जीव को संसार से भागना नहीं जागना सिखाते हैं। संत इस क्षणभंगुर संसार को देखने की दृष्टि देते हैं। ये उद्गार श्री हित अम्बरीष ने अग्रसेन भवन में चल रही दूसरे दिन की ‘भगवद प्रेम’ विषय वार्ता में व्यक्त किए। उन्होंने कहा कि प्रभु से मिलने के लिए स्वयं से परिचय होना जरूरी है कि जीव इस संसार में किसलिए आया है। उसका निज स्वरूप क्या है। जिस जीव का स्वयं से परिचय नहीं है वह प्रभु को कभी भी नहीं पा सकता।

प्रभु को पाने के लिए सत्संग, सेवा, सिमरण रूपी त्रिवेणी की धारा में स्नान करना पड़ता है। प्रभु को पाने के लिए उत्कट अभिलाषा का होना अनिवार्य है और यह अभिलाषा सतत सत्संग में जाने से ही जागृत होती है जब जीवन में प्रभु को पाने की अभिलाषा जागृत होती है तो उसके जीवन में संत का आगमन होता है। संत जीव को सेवा से जोड़ता है और भक्त और भगवान के बीच संबंध स्थापित करता है। उन्होंने संत की महता बताते हुए कहा कि संसार रूपी नदी को पार करने के लिए ज्ञान व भक्ति की नौका एवं संत रूपी मल्लाह की आवश्यकता होती है। उन्होंने संत रविदास के वृतांत के माध्यम से बताया कि संत की कोई जाति व संप्रदाय नहीं होता। उनका संबंध केवल प्रभु से होता है। इसलिए एक सच्चा संत कभी भी किसी से कोई भेद नहीं करता। उसके लिए शरण में आए सभी जीव एक समान होते हैं। वह सभी का कल्याण करने के लिए ही इस धरा धाम पर आते हैं और जीव के उद्धार का संकल्प करते है और उसके इस संकल्प की सिद्धि में समस्त प्रकृति सहायक सिद्ध होती है अतः जीवन में संत और सत्संग अति आवश्यक है।

अग्रसेन भवन में त्रिदिवसीय सत्संग के दौरान प्रवचन सुनते श्रद्धालुगण।

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