यादें / आजादी से पहले 100 रु. से ज्यादा माल गुजारी देने वाले को ही था वोट देने का अधिकार



ध्रर्मपाल मलिक, पूर्व सांसद। (फाइल) ध्रर्मपाल मलिक, पूर्व सांसद। (फाइल)
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ध्रर्मपाल मलिक, पूर्व सांसद। (फाइल)ध्रर्मपाल मलिक, पूर्व सांसद। (फाइल)

  • 1984 के लोकसभा चुनाव में चौधरी देवीलाल को हराने वाले धर्मपाल मलिक ने साझा किए बरसों पुराने संस्मरण

Dainik Bhaskar

Oct 07, 2019, 11:15 AM IST

गोहाना क्षेत्र के बिधल गांव में जन्मे एडवोकेट धर्मपाल मलिक ने 1977 में कांग्रेस पार्टी से गोहाना से एमएलए का चुनाव लड़ा। तीसरे स्थान पर रहे। साल 1984 में लोकसभा चुनाव में देवीलाल को शिकस्त देकर वे लोगों के बीच चर्चा में आ गए। देवीलाल लहर के दौरान 1989 में वे कपिल देव शास्त्री से हार गए लेकिन 1991 में फिर उन्होंने लोकसभा में कपिलदेव शास्त्री को हराया। 1996 में लोकसभा चुनाव में तीसरे नंबर पर रहे। 2004 में लोकसभा में फिर धर्मपाल मलिक को टिकट दी और वे किशनसिंह सांगवान से हारे। 2005 में धर्मपाल मलिक गोहाना से विधायक बने। इसके बाद 2008 में उपचुनाव नहीं जीत पाए। इसके बाद इन्हें चुनाव नहीं लड़ा।

 

राजनीति में एक दौर था कि नेता वादे के पक्के और मतदाता जुबान के धनी होते थे। अब हालात यह हैं कि एक घर में अलग-अलग विचार हैं और तीन-तीन जगह वोट जाती हैं। आजादी से पहले हुए चुनाव की बात है। साल 1937 के चुनाव के समय पंजाब राज्य में रोहतक सीट थी। एमएलसी चुने जाते थे। अब एमएलए बोलते हैं। दूसरे विश्व युद्ध की वजह से फिर 9 साल बाद 1946 में चुनाव हुआ। इस चुनाव में चौ. लहरी सिंह ने टीकाराम को हराया था और विजेता बनकर मंत्री बने। चुनाव प्रचार का एक किस्सा काफी मसहूर रहा। चौ. लहरी सिंह कांग्रेस पार्टी से और चौ. टीकाराम यूनियनिस्ट पार्टी से चुनाव लड़ रहे थे। दोनों नेताओं ने क्षेत्र में प्रचार पर जोर लगाया। उस समय मतदाता जुबान के धनी होते थे।

 

खास बात यह भी थी कि आजादी से पहले हर किसी को मतदान करने का अधिकार नहीं था। उस समय 100 रुपए से अधिक का आयकर या माल गुजारी भरने वाला व्यक्ति ही मतदान कर सकता था। मुश्किल से गांव के अनुसार 4 या 5 वोट ही होते थे। उन्हीं के बीच व्यक्तिगत तौर पर मिलकर वोट मांगी जाती थी। अब लोकतंत्र में हर 18 आयु के युवा को मतदाता पहचान पत्र बनवाकर वोट डालने का अधिकार है। उस समय नेता भी वादे के पक्के थे। 1946 के चुनाव में टीकाराम को हराकर लहरी सिंह रोहतक सीट से एमएलसी चुने और फिर मंत्री बने। शिमला में उनका कार्यालय था।

 

वहां एक व्यक्ति उनके पास आता था तो यूं ही लहरी सिंह ने पूछ लिया कि कोई समस्या ताे नहीं तो उसने बताया कि गांव में पानी नहीं हा रहा। लहरी सिंह गांव पहुंचे और पानी की व्यवस्था का वादा कर दिया। बाद में पता चला कि गांव उनके क्षेत्र में नहीं बल्कि दूसरी क्षेत्र फ्रंटियर यानि मौजूदा यूपी में आता है। लहरी सिंह ने चिंता जताई लेकिन वादा अनुसार लखनऊ पहुंचे और वहां के मंत्री से कहा कि गलती से आपके क्षेत्र का वादा कर दिया। अब आप इसे पूरा करवाएं। फ्रंटियर के मंत्री इस पर खुश हुए और प्राथमिकता से समस्या का हल करवाया।
जैलदार ने कानूनी तौर पर विरोधी पक्ष के वोट तक की भरी थी हामी: पूर्व सांसद धर्मपाल मलिक ने बताया कि कथूरा गांव में उस दौर में मालेराम जैलदार होते थे। गांव में ही किसी विवाद में जैलदार का एक पक्ष से कोर्ट में मामला विचाराधीन था। कांग्रेसउम्मीदवार लहरी सिंह जैलदार के पास वोट मांगने पहुंचे। उन्होंने बताया कि आप बाद में आए, उन्होंने तो टीकाराम को जुबान दे दी थी। चौ. लहरी सिंह ने इस पर दबाव नहीं बनाया बल्कि कहा कि ठीक है तुमने हां भर रखी है तो आपके दूसरे पक्ष की ही दिलवा दो।

 

जैलदार ने कहा कि मैंने तो उनकी तरफ से भी खुद ही हां कर दी थी। यह सुन लहरी सिंह दूसरे पक्ष के पास पहुंचे। उन्होंने कहा कि वोट किसको दोगे। उन्होंने कहा कि सुना है जैलदार ने टीकाराम को उनकी हां कर दी है। अब उन्हीं को ही देंगे। इस पर लहरी सिंह हैरान हुए लेकिन जुबान के पक्के लोगों की मिसाल लेकर खुशी से लौट गए। वर्ष 1937 का यह चुनाव टीकाराम ने चुनाव जीता था।

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