पाएं अपने शहर की ताज़ा ख़बरें और फ्री ई-पेपर

डाउनलोड करें

एक साल की बच्ची के लिवर तक ब्लड सर्कुलेशन के लिए गाय की नसें लगाईं, 14 घंटे चली सर्जरी

2 वर्ष पहले
  • कॉपी लिंक
हूर अपने माता-पिता साराह और अहमद की तीसरी संतान है। - Dainik Bhaskar
हूर अपने माता-पिता साराह और अहमद की तीसरी संतान है।
  • हरियाणा के गुरुग्राम में सऊदी अरब की एक साल की बच्ची हूर का लिवर ट्रांसप्लांट हुआ
  • सऊदी के डॉक्टरों ने बच्ची के माता-पिता को दी थी भारत में सर्जरी कराने की सलाह

गुरुग्राम (हरियाणा).  गुरुग्राम के निजी अस्पताल में दुनिया में पहली बार अनोखा लिवर ट्रांसप्लांट हुआ। इसमें गाय की नसों का इस्तेमाल किया गया। ट्रांसप्लांट सऊदी अरब की एक साल की बच्ची का किया गया। यह सर्जरी 14 घंटे तक चली। दो हफ्ते तक डॉक्टरों की निगरानी में रहने के बाद बुधवार को बच्ची को डिस्चार्ज कर दिया गया है।


लिवर ट्रांसप्लांट सर्जन डॉ. गिरिराज बोरा ने बताया कि बच्ची बाइल डक्ट्स के बिना पैदा हुई थी। उसकी पोर्टल नस (पित्त नलिका) अविकसित थी। इसलिए सर्जरी में बोवाइन जग्युलर नस (गाय के गले की नस) का इस्तेमाल किया गया। यह नस नए लिवर में रक्त पहुंचाने का काम करती है। सर्जरी के दौरान बच्ची का ख्याल रखना चुनौती भरा काम था, जिसे डॉक्टर्स और पैरामेडिकल के समूह ने बखूबी निभाया।

सऊदी के डॉक्टरों ने दी थी भारत में सर्जरी कराने की सलाह
बच्ची हूर अपने माता-पिता साराह और अहमद की तीसरी संतान है। उसे जन्म के तीन माह बाद ही गंभीर बीमारी ने जकड़ लिया था। सऊदी के डॉक्टर रिस्क नहीं लेना चाहते थे। इसलिए बिलियरी बाइपास सर्जरी की असफलता के बाद उन्होंने भारत में सर्जरी कराने की सलाह दी। सर्जरी सफल रही। बच्ची के पिता अहमद ने भारत और अस्पताल के डॉक्टरों का शुक्रिया अदा किया।

ऐसी बीमारी थी, जो 16 हजार नवजातों में से एक को होती है
डॉ. गिरिराज बोरा ने कहा कि सऊदी के डॉक्टरों ने बच्ची को बिलियरी एट्रेसिया नाम की बीमारी से ग्रसित पाया। यह बीमारी 16 हजार में से एक नवजात को होती है। ऐसे बच्चों में बाइल डक्ट्स (पित्त वाहिका) का विकास नहीं हो पाता है। बच्ची का वजन 5.2 किलो था। ऐसे में ट्रांसप्लांट की प्रक्रिया बेहद जटिल होती है। हालांकि अब वह स्वस्थ है।

खबरें और भी हैं...