अागे निकलने की हाेड़ में रिश्ताें काे पीछे मत छाेड़ाे : सुधांशु महाराज

Panipat News - जैसा कि ज्योतिषाचार्य एवं अवध धाम मंदिर के संस्थापक पं. दाऊजी महाराज ने दैनिक भास्कर के आग्रह पर लिखित में भेजे...

Apr 03, 2020, 08:17 AM IST

जैसा कि ज्योतिषाचार्य एवं अवध धाम मंदिर के संस्थापक पं. दाऊजी महाराज ने दैनिक भास्कर के आग्रह पर लिखित में भेजे प्रवचन...

चैत्र मास की नवमी तिथि शक्ति एवं मर्यादा का प्रतीक मानी गई है। ऐसा वेद साथ शास्त्र कहते हैं क्योंकि नवमी तिथि जहां एक तरफ दुर्गा पूजन का विश्राम दिवस माना गया है।

सीधा सा अर्थ केवल एक की जहां शक्ति और मर्यादा का मिलन का दुर्लभ संयोग बन रहा हो, उस संजोग को विद्वान व्यक्ति ही अपनी भक्ति माई आंखों से एवं हृदय में विराजमान परमात्मा के संजोग से अनुभव कर सकता है। एक सीधा और स्पीक प्रयोग कि आप शक्ति का प्रयोग अगर मर्यादा में रहकर करेंगे, तो वह विखंडित नहीं होगा, विखंडन नहीं होगा। किसी के लिए वह दुराचारी नहीं होगा। वह गलत नहीं होगा। केवल शक्ति का प्रयोग दूसरों की रक्षा के लिए होगा।

किसी का इंतजार मत कराे कि काेई दूसरा तुम्हें संवारेगा

इंसान काे हमेशा खुद की कद्र करते हुए जीवन जीना चाहिए। अपनी तस्वीर खुद ही सजाअाे। इस बात का इंतजार मत कराे कि काेई दूसरा तुम्हें संवारेगा। स्वयं काे स्वयं के लिए प्रशिक्षित कराे। एक ही बात साेचाें काे तुम परमात्मा के हस्ताक्षर हाे। तुम्हारे जैसा परमात्मा ने किसी काे नहीं बनाया है। अपने व्यक्तित्व काे निर्माण खुद कराे।

अासमान से उड़ते हुए पक्षी से लें जीवन जीने की सीख

महाराज ने कहा कि इंसान काे अासमान में उड़ने वाले पंछी के जीवन से सीख लेनी चाहिए। जीवन जीने का कला अासमान में उड़ते पंछी के समान बनाअाे। अासमान में काेई पगडंडी नहीं हाेती। फिर भी पंछी अपने विवेक के कारण उड़ता रहता है। अपनी महिमा काे पहचानाे और जीवन में आगे बढ़ो। जीवन में हर कदम पर कुछ न कुछ सिखो।


पुरुषार्थी व्यक्ति ही भगवान को प्रिय होता है

भागवत कथा कहती है कि जो महत्वपूर्ण पदों पर बैठे हैं। उनको किसी न किसी रूप में मैंने ही बिठाया है, लेकिन वह पद की गरिमा को महिमा मानकर लोगों का खंडन करते हैं। सेवा नहीं करते यहीं उनके विखंडन का कारण होता है। पुरुषार्थी व्यक्ति ही भगवान को प्रिय होता है क्योंकि पुरुषार्थ में अर्थ को नहीं जोड़ा सकता केवल पुरुषार्थ का अर्थ तो धर्मार्थ है। जवाब धर्मार्थ हो जाते हैं तो आप का रास्ता केवल सेवा का बचता है। ज्ञान की कोई सीमा नहीं है। अर्जुन ज्ञानी तो था लेकिन आत्म ज्ञानी नहीं था। आत्म ज्ञानी बनाने के लिए भगवान श्री कृष्ण ने उसको कुरुक्षेत्र के पावन धरा पर गीता का ज्ञान दिया। कहा हे अर्जुन मैं ही ईश्वर हूं तू तो नश्वर है और जो नश्वर शरीर है वह नष्ट होने के लिए बना है।

पुरुषार्थी सबसे बड़ा परमाणु और धर्मार्थ है

पुरुषार्थी सबसे बड़ा परमाणु एवं धर्मार्थ है। जो व्यक्ति पुरुषार्थ करता है। समझो वह सबसे बड़ा धर्म और कर्म कर रहा है। क्योंकि पावन ग्रंथ भी इसी प्रकार का उपदेश हम सबको किसी न किसी रूप में देते हैं। नर सेवा ही नारायण सेवा है। भगवान स्वयं कहते हैं कि जो व्यक्ति मानव की सेवा करता है। दीन दुखियों की मदद करता है। दीन दुखियों की सहायता के लिए जिस व्यक्ति के हाथ उठते हैं। वह व्यक्ति धन्य है वह महान है, क्योंकि प्रत्येक व्यक्ति के अंदर चाय वह जनसाधारण हो चाहे वह किसी महत्वपूर्ण पद पर हो वह मेरा ही अंश होता है।


नियंत्रण रखने वाला दुख में भी नहीं घबराता

जिस इंसान में मस्तिष्क पर संतुलन रखने की क्षमता हाेती है, वह व्यक्ति दुख की घड़ियाें में भी घबराता नहीं है। विपरीत समय में भी दिल पर पत्थर रख लेता है। स्वयं से बार-बार प्रश्न करने की अादत डालाे। जाे इंसान इस कला काे सीख जाएगा, वह अपने गलतियाें पर भी विचार करेगा। जब गलतियाें पर विचार करने लगाेगे ताे अच्छे इंसान बनते चले जाएंगे।


वह व्यक्ति धन्य है जो सदैव दूसरों की सेवा करता है

इंसान काे भेड़चाल छाेड़ वक्त से सीख लेनी चाहिए


चैत्र मास की नवमी तिथि शक्ति व मर्यादा की प्रतीक : दाऊजी महाराज

भास्कर न्यूज |पानीपत

जैसा कि सुधांशु महाराज ने भास्कर के अाग्रह पर लिखित मेें प्रवचन भेजे ...

जिंदगी काे मांगलिक यात्रा बता हर इंसान भीड़ बनाकर इसके पीछे ही भागता जा रहा था। सड़काें पर दिनभर जाम, हादसे व एक दूसरे से अागे निकलने की ही हाेड़ लगी रहती थी। अब वक्त ने सब राेक दिया। फिर भी इंसान संयम बनाकर एक दूसरे की सलामती की कामना कर रहा है। कितने लाेग सुबह दूसराें की सेवा में निकल रहे हैं। इस तरह इंसान काे वक्त से सीख लेनी चाहिए। वक्त से बढ़कर कुछ नहीं। हमेशा एक दूसरे से अागे निकलने की हाेड़ में इंसानियत व रिश्ताें काे पीछे नहीं छाेड़ना चाहिए।

महाराज ने कहा कि अाज के इस लाॅकडाउन से इंसान सबक लेकर अपनी जिम्मेदारियां भी निभाएं। भीड़ बनाकर ताे भेड़ बकरियां भी चलती हैं। जीवन जीने की कला सीखें। व्यक्ति का स्वभाव बदला जा सकता है। क्षमताएं विकसित की जा सकती हैं। सिर्फ सीखने की क्षमता बढ़ाएं। जीवन में संतुलन बनाकर जीएं।

दाऊजी महाराज

सुधांशु महाराज

भक्त सत्संग सुनने नहीं पहुंच पा रहे इसलिए उन तक प्रवचन पहुंचा रहा भास्कर

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