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यह कर्फ्यू डराने वाला नहीं, भागदौड़ भरी जिंदगी में एक जगह ठहर कर महामारी को हराने की हिम्मत दिखाने वाला था

10 महीने पहले
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ये जनकर्फ्यू डराने वाला नहीं, हिम्मत दिखाने वाला था। क्योंकि भागदौड़ भरी जिंदगी में एक जगह टिक कर बैठने के लिए धैर्य चाहिए। जिंदगी का दूसरा सबसे बड़ा कर्फ्यू देखा। अंतर ये है कि 1 नवंबर 1966 का जो बंद था वह शहर पर दुखों का पहाड़ था। तब डर के मारे घरों में दुबके थे, आज एक वायरस को डराने और हराने के लिए घरों में स्वैच्छा से रहे। 1 नवंबर की वो दोपहर आज भी याद है जब गली में कोई आहट भी होती थी तो खिड़कियों की जंग खाई चिटकनियां भी कस कर बंद कर दी गईं थीं। वो शाम दहशत से भरी थी और एक ये शाम थी जिसने सभी को एक बीमारी से लड़ने के लिए उत्साह से भर दिया। सभी ने हमारी देखरेख में जुटे सेवकों का शुक्रिया अदा किया। चाहे वे डॉक्टर, नर्स हों या सफाई सेवक। 1 नवंबर 1966 को पंजाब से अलग होने के बाद हरियाणा बना। विपक्षी पार्टियाें के नेताअाें ने लाल बत्ती चाैक से गुड़ मंडी तक जुलूस निकाला। जबरन बाजार बंद करवाए। मसला तब बिगड़ा जब एक नेता ने माैके पर माैजूद सिटी थाने के इंचार्ज की पगड़ी काे उछाल दिया। लाेगाें काे तीतर-बीतर करने के लिए पुलिस ने फायर किए। इसमें राजनेता दसराज की माैत हाे गई। प्रदर्शनकारी उनकी लाश लाल बत्ती चाैक पर ले अाए। यहां दीवान चंद टक्कर की दुकान खुली देख भड़क गए। चेतावनी पर भी टक्कर ने दुकान बंद नहीं की ताे प्रदर्शनकारियों ने उन समेत शहीद भगत सिंह के साथी रहे क्रांति कुमार व संतलाल लांबा भी दुकान में बंद कर पेट्राेल छिड़क अाग लगा दी। इससे दुकान में बंद तीनाें साथियाें की माैत हाे गई। वह पानीपत के इतिहास का काला दिन था, जिसके बाद शहर को भय से भरे बंद यानी कर्फ्यू का सामना करना पड़ा था।

शर्मसार वाली कहानियां छाेड़ अब गर्वित वाले पल सांझा करूंगा

उम्र के इस पड़ाव पहली बार एेसा जनता कर्फ्यू देखा जिसने हर देशवासी में जज्बा भरा। अाज लाेग उस दिन की भांति डरे हुए नहीं। हमने विश्व काे एकजुटता का जाे संदेश दिया है, इस पर पूरे विश्व काे गर्व करना चाहिए। मैं अपने बच्चाें काे 1966 व 1975 की शर्मनाक कहानियां ही सुनाता था। जीवन के इस पड़ाव में गर्वित करने वाले पल भी जी लिए।

जैसा कि 75 वर्षीय साहित्यकार एवं समाज सेवी रमेश पुहाल ने बताया

रमेश पुहाल

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