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  • Sons living father's dreams; Some are giving education to children and some have started a campaign to save their daughter

प्रेरणा / पिता के सपनों को जी रहे बेटे; कोई बच्चों को दे रहा शिक्षा तो किसी ने शुरू की बेटी बचाने की मुहिम

बच्चों को पढ़ाते डॉक्टर बंसल। बच्चों को पढ़ाते डॉक्टर बंसल।
पिता के फोटो के साथ रामनिवास। पिता के फोटो के साथ रामनिवास।
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बच्चों को पढ़ाते डॉक्टर बंसल।बच्चों को पढ़ाते डॉक्टर बंसल।
पिता के फोटो के साथ रामनिवास।पिता के फोटो के साथ रामनिवास।

  • कैथल में डाॅक्टर नवीन बंसल 30 बच्चों की पढ़ाई का खर्च उठा रहे
  • पिता की बेटी बचाने की मुहिम को आगे बढ़ा रहे जींद के रामनिवास शर्मा

Dainik Bhaskar

Jan 15, 2020, 01:50 AM IST

कैथल/जींद  (शिवकुमार गौड़/रवि हसिजा). पिता के सपने को पूरा करने के लिए उनके बेटों ने जी जान लगा दी। प्ररित करने वाले दो किस्से, एक झुग्गी-झोपड़ियों में बच्चों को शिक्षा दे रहा, तो दूसरा बेटी बचाओ मुहिम को बढ़ा रहा आगे। 

केस 1- डाॅक्टर बेटा झुग्गियों में रहने वाले बच्चों को कर रहा शिक्षित

पिता की समाजसेवा करने की इच्छा पूरी करने के लिए डाॅक्टर बेटा झुग्गी-झोपड़ियों में रहने वाले बच्चों को शिक्षित कर रहा है। फिलहाल नर्सरी से 10वीं कक्षा तक के करीब 30 बच्चों को शिक्षा दिला रहे हैंं। खर्च भी खुद उठा रहे हैं। ये कहानी है कैथल के पूंडरी निवासी ऑर्थो स्पेशलिस्ट डॉ. नवीन बंसल की। वे बताते हैं कि उनके पिता 75 वर्षीय निरंजन बंसल कैथल के पूंडरी की अनाजमंडी में आढ़ती हैं। उनकी इच्छा है कि उनका बेटा समाजसेवा करे, तभी खुद को सौभाग्यशाली मानेंगे। 


पिता को सम्मान देने के लिए उन्होंने व्यस्त समय में से कुछ समय निकालकर कैथल की पट्टी अफगान में झुग्गी-झोपड़ियों में रहने वाले परिवारों के बच्चों को शिक्षित करने के लिए प्रेरित किया। बच्चों के अभिभावक मान गए तो सभी बच्चों का स्कूलों में दाखिला कराकर पूरा खर्च खुद उठाने की जिम्मेदारी ली। डॉ. नवीन बंसल का कैथल में निजी अस्पताल है। इसके बावजूद रविवार को खुद बच्चों को पढ़ाकर फीडबैक लेते हैं। वर्दी, किताबों, फीस,  बैग व अन्य स्टेशनरी संबंधी जरूरतों के बारे में पूछते हैं। बच्चों के अभिभावकों से भी फीडबैक लेते हैं।

केस 2- पिता ने गांव से शुरू की बेटी बचाने की मुहिम, फिल्म बना बेटे ने पूरे देश को जोड़ा

80 दशक में जब अल्ट्रासाउंड मशीनें आई तो जगह-जगह लड़का पैदा करने के बोर्ड लग गए थे, जाे बाद में हटाए गए, लेकिन प्राइवेट अस्पतालों में अल्ट्रासाउंड के जरिए कौख में लड़का-लड़की के बारे में बताया जाने लगा और शर्तियां लड़का होने के बोर्ड लगने लगे थे। इसके चलते कोख में ही बेटियों को मारा जाने लगा था। यह देखकर सफीदों के राम नगर निवासी पंडित काम सिंह काफी विचलित हुए और उन्होंने विरोध शुरू किया। सबसे पहले उन्होंने अपने गांव से कविता के माध्यम से बेटियां बचाने की मुहिम शुरू की। 


चाैपालाें में लोगों को कन्या भ्रूण हत्या के खिलाफ जागरूक करना शुरू कर दिया। इसके बाद 90 के दशक में दंपतियों को बेटी बचाने के लिए 8वां वचन (आठवां फेरा) दिलवाना शुरू कर दिया। अब इसी मुहिम काे उनके बेटे रामनिवास शर्मा आगे बढ़ा रहे हैं। हाल गुरुग्राम निवासी रामनिवास शर्मा ने अपने पिता द्वारा लिखी सभी कविताओं की 3 हजार पुस्तकें छपवाकर बंटवाईं। पुस्तकें बंटवाने करने का असर यह हुआ कि विश्वविद्यालयों में एमफिल, पीएचडी करने वाले छात्र उनके पिता पर थीसिस लिखने लगे।
 

मात मनै मरवाइये ना, शान देखना चाहू सू...
उनके पिता द्वारा लिखा गाना -मात मनै मरवाइये ना, शान देखना चाहू सू, गर्भ तै बाहर निकलकै हिंदुस्तान देखना चाहूं सू... इतना पापुलर हुआ कि हर किसी की जुबान पर चढ़ गया। आज यह गाना सरकार के महिला एवं बाल विकास विभाग की सरकारी कॉलर ट्यून बन गया है। उन्होंने 8वां वचन एक प्रतीक्षा फिल्म का निर्माण कराया। सरकार ने जिसे 6 माह के लिए टैक्स फ्री भी किया। फिल्म 2 घंटे 14 मिनट की होने के चलते इसे एक घंटे का कराया गया। अब रामनिवास पूरे देश में घूम-घूमकर फिल्म दिखाकर जागरूक कर रहे हैं।

मोदी के भाई को सौंपा था मांगपत्र, पीएम ने की शुरुआत 
रामनिवास शर्मा ने 2014 में प्रधानमंत्री मोदी के भाई सोमा भाई मोदी से गोहाना में मुलाकात कर ये गाने और नाटक दिखाया तो वे हैरान रह गए कि यह इतनी बड़ी समस्या है। इस दौरान बेटी बचाओ समेत 14 बिंदुओं का पत्र उन्होंने नरेंद्र मोदी के नाम सौंपा था। इसके बाद पानीपत से बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ की मुहिम की शुरुआत 22 जनवरी 2015 को हुई।

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