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नवरात्र महोत्सव / पाक से मां भीमेश्वरी देवी को लेकर कुरुक्षेत्र को चले थे भीम, बेरी में उतारने पर हो गईं विराजमान



मां भीमेश्वरी देवी की पूजा अर्चना करते पंडित, दरबार में लगे 84 घंटे। मां भीमेश्वरी देवी की पूजा अर्चना करते पंडित, दरबार में लगे 84 घंटे।
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मां भीमेश्वरी देवी की पूजा अर्चना करते पंडित, दरबार में लगे 84 घंटे।मां भीमेश्वरी देवी की पूजा अर्चना करते पंडित, दरबार में लगे 84 घंटे।

Dainik Bhaskar

Oct 12, 2018, 05:35 AM IST

भारत भूषण वधवा, बेरी/ झज्जर. धर्मनगरी बेरी में महाभारतकालीन मां भीमेश्वरी देवी मंदिर में कई राज्यों से 5 से 6 लाख श्रद्धालु नवरात्र में दर्शन करने के लिए आते हैं। महाभारत युद्ध के दौरान पांडु पुत्र भीम पाकिस्तान के हिंगजाल मंदिर से मां को अपनी गोद में लेकर आ रहे थे। रास्ते में बेरी में लघुशंका के लिए उन्होंने मां को नीचे उतारा तो शर्त के अनुसार वे यहीं पर विराजमान हो गई। बाद में गंधारी ने यहां पर मां का मंदिर बनवाया। तब से ही यहां की मान्यता लाखों भक्तों में हैं। 
बेरी में महाभारत काल से मां भीमेश्वरी का मंदिर हैैैै। मान्यता है कि मां की मूर्ति को पांडु पुत्र भीम पाकिस्तान के हिंगजाल पर्वत से लेकर आया था। जब कुरुक्षेत्र में महाभारत के युद्ध की तैयारी चल रही थी तो भगवान कृष्ण ने भीम को कुल देवी मां से युद्ध में विजय का आशीर्वाद लेने भेजा था।

 

भीम ने मां को अपने साथ चलने का आग्रह किया तो मां ने पांडु पुत्र से कहा कि मैं तुम्हारे साथ तो चलूंगी, लेकिन तुम मुझे अपनी गोद में रखोंगे। रास्ते में जहां भी उतारोंगे मैं उस स्थान से आगे नहीं जाऊंगी। भीम ने मां की शर्त मान ली और गोद में उठाकर युद्ध भूमि की तरफ चले।

 

जब भीम मां को लेकर बेरी कस्बे से गुजर रहे थे तो भीम को लघुशंका के लिए मां को अपने कंधे से उतारना पड़ा। बाद में मां को वापस चलने के लिए अपनी गोद में उठाने लगा तो मां ने भीम को अपनी शर्त याद दिलाई। फिर भीम ने मां की पूजा कर बेरी के बाहर स्थापित कर दिया। तभी से मां को भीमेश्वरी देवी के नाम से जाना जाता हैैैै। बाद में युद्ध समाप्त होने के बाद गंधारी ने वहां पर मां का मंदिर बनवा दिया।

 

मूर्ति एक, मंदिर दो : पूरे देश में यह ऐसा अनोखा मंदिर है, जहां पर मां की मूर्ति तो एक है, लेकिन मंदिर दो। मां भीमेश्वरी देवी की प्रतिमा को बाहर वाले मंदिर में सुबह 5 बजे लाया जाता हैैै। दोपहर 12 बजे मां की मूर्ति को पुजारी अपनी गोद में उठाकर शहर के अंदर वाले मंदिर में लेकर जाते हैं। बाद में मां रात भर अंदर वाले मंदिर में आराम करती हैैं। इसकोे लेकर मान्यता है कि मां का मंदिर जंगलों में था। तब ऋषि दुर्वाषा ने मां से विनति की कि वे उनके आश्रम में आकर भी रहे। तब से ही दो मंदिरों की परंपरा चल रही है। 
 

15 वर्ष बाद दोबारा लगे 84 घंटे : इस बार मां बेरी वाली के भक्त लगभग 15 साल बाद मां के चौरासी घंटों वाले स्वरूप के दर्शन करेंगे। दरबार में पुराने समय से चौरासी घंटे लगे हुए थे। मां भीमेश्वरी देवी को चौरासी घंटे वाली देवी  के नाम से जाना जाता हैं।

 

माता भीमेश्वरी देवी मंदिर आश्रम ट्रस्ट बेरी  ने 84  घंटों को  मंदिर के पुनर्निर्माण के दाैरान उतारा हुआ था उन्हें माता के गर्भ गृह (मुख्य स्थान) में दोबारा लगाया गया है।  मुख्य पुजारी  पुरुषोत्तम वशिष्ठ ने बताया कि माता की भोर वाली स्तुति में इन 84 घंटों को पुजारी द्वारा एक साथ बजाया जाता है जो की एक  सकारात्मक ऊर्जा का संचार करते हैं। 
 

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