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ईंट-भट्‌ठों पर एनजीटी के सारे नियम ताक पर, काेयला महंगा हाेने पर वेस्ट मटेरियल कर रहे धड़ल्ले से प्रयाेग

Rohtak News - िजले की सबसे बड़ी ईंट भट्ठा मंडी हसनगढ़ में केंद्र सरकार के नियमों की धज्जियां उड़ाई जा रही है। केंद्र सरकार ने...

Bhaskar News Network

Aug 20, 2019, 08:45 AM IST
Sampla News - haryana news all the rules of the ngt on brick and kilns are being followed the use of waste material is being done at the cost of expensive kayla
िजले की सबसे बड़ी ईंट भट्ठा मंडी हसनगढ़ में केंद्र सरकार के नियमों की धज्जियां उड़ाई जा रही है। केंद्र सरकार ने पर्यावरण प्रदूषण को कम करने व ईंटों की गुणवत्ता अच्छी करने के लिए ईंट भट्ठों के मालिकों को जिक-जैग तकनीकी अपनाने का निर्देश दिए हुए है। ताकि पर्यावरण को संरक्षित किया जा सके। जिले में 114 ईंट भट्ठा संचालित हैं। हसनगढ़ क्षेत्र के 60 में से 34 ईंट भट्ठा जिक-जैग तकनीक को दिए गए समय में पूरा कर पाए थे। जिक-जैग तकनीक लगाने व कोयला के दाम बढ़ने की बात कह भट्ठा संचालक मोटा मुनाफा कमाने की चाहत में एनजीटी के नियमों को भी ताक पर रख रहे है। भट्ठा संचालक कोयले की जगह वेस्ट मटेरियल का इस्तेमाल कर रहे है। जो मानव स्वास्थ्य के साथ-साथ खेती व वन्य जीव-जंतुओं के लिए भी हानिकारक है। गांव के ही किसानों ने भट्ठा संचालकों की शिकायत सीएम विंडाे पर दी थी। ईंट भट्ठा संचालक दिल्ली के मुंडका, पीरागढ़ी व कीर्ति नगर से जूते, चप्पलों का वेस्ट मैटीरियल व कुलताना, नया बांस व गांधरा औद्योगिक क्षेत्र के अंतर्गत संचालित होने वाली पुराने टायरों से तेल निकालने के बाद बची राख को खरीदकर एकत्रित कर रहे है। इसी राख को कोयले के स्थान पर भट्ठा संचालक प्रयोग करने की तैयारी में हैं। कट्टों में भरी राख उड़कर खेती को भी खराब कर रही है।

गांव हसनगढ़ के एक ईंट भट्‌ठे पर रखा वेस्ट मटेरियल।

अब गुजरात से खरीद रहे कोयला : ईंट भट्ठा व्यवसाय से जुड़े एक भट्ठा संचालक ने बताया कि पहले गुवाहाटी से कोयला खरीदकर मंगवाया जाता था। जो अब नहीं आ रहा। कारण वहां कोयले की खदान बंद है। अब गुजरात के गांधी धाम से कोयला खरीदा जा रहा है। जो वर्तमान में करीब 12 हजार रुपए प्रति क्विंटल के हिसाब से एनसीआर में पहुंच रहा है। जिस कारण लागत बढ़ गई है। इसी लागत को कम करने के लिए टायरों की राख व जूते ,चप्पलों के वेस्ट मटीरियल को एकत्रित किया जा रहा है। जो कोयले की अपेक्षा बहुत सस्ता होता है। चप्पल, जूते का वेस्ट मटेरियल करीब डेढ़ रुपए प्रति किग्रा. तो टायरों की राख करीब 2 रुपए प्रति किग्रा की पहुंच मिल रही है।

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कोयले से पकाई गई ईंट की गुणवत्ता अच्छी : जिन ईंट भट्ठों में कोयले का प्रयोग किया जाता है, उसकी ईंटों का रंग ज्यादा लाल होता है। जबकि जूते, चप्पल व टायरों की राख से पकाई गई ईंटों का रंग ज्यादा सफेद व चमकदार होता है। हालांकि कोयले से पकाई गई ईंटों की गुणवत्ता ज्यादा अच्छी होती है। लेकिन देखने में ज्यादा सुंदर नहीं होती।

ईंट भट्ठा नियमों के तहत कर रहे काम

जिला रोहतक ईंट भट्ठा ईंट एसोसिएशन के प्रधान अनूप सिंह दहिया का कहना है कि ज्यादातर ईंट भट्ठों पर कोयला, सरसों की तूड़ी व लकड़ी के बुरादे को पकाई में इस्तेमाल किया जाता है। जिले में दो-चार भट्‌ठों को छोड़ बाकि नियमों का पूरा पालन कर रहे है। पर्यावरण संरक्षण को लेकर ईंट भट्ठा एसोसिएशन लगातार काम करती रही है। जिले के 154 में से 114 ईंट भट्ठा को जिक-जैग तकनीकी के तहत परमिट मिला हुआ है।

ईंट भट्ठों संचालकों को राख की शिकायत की थी

किसान सूरजभान सैनी का कहना है कि ईंट भट्ठों पर एकत्रित राख हवा के साथ खेतों में पहुंच रही है। जिससे पौधों की ग्रोथ नहीं हो पा रही। कई बार ईंट भट्ठों संचालकों को राख की शिकायत की गई। लेकिन समस्या का समाधान नहीं हो रहा हैं।

केस 

राख से मवेशियों का चारा भी खराब हो रहा

महिला सरला देवी का कहना है कि मवेशियों को चारा लेने उनको हर रोज खेतों में आना होता है। लेकिन ईंट भट्ठों की राख से खेती के साथ मवेशियों का चारा भी खराब हो रहा है। जिससे कई बार मवेशी भी बीमार हो जाते है।

केस 

अपने खेत में भी काम करने में आ रही परेशानी

किसान अनिल कुमार का कहना है कि ईंट भट्ठा संचालकों ने टायरों की राख व जूते, चप्पलों का वेस्ट मैटीरियल एकत्रित कर रखा है। हवा के साथ राख खेतों में पहुंच रही है। खेत तो खराब हो रही है, बल्कि खेत में काम करने वालों को भी परेशानी हो रही है।

केस 

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