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चार साल पहले आठ महि

2 वर्ष पहले
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छेड़छाड़ रोकने के लिए चार साल पहले 8 महिलाओं ने शुरू किया गुलाबी ऑटो का सफर, अब रोहतक में 25, जींद में 21 और पानीपत में 4 महिलाएं मुहिम को बढ़ा रहीं आगे, लोन अदा कर मालिक बनीं, संवार रहीं बच्चों का भविष्य

चार साल पहले आठ महिलाओं से शुरू हुई गुलाबी ऑटो मुहिम हरियाणा में सशक्तिकरण, सामाजिक बदलाव और स्वरोजगार का अनूठा उदाहरण बन चुकी है। अब रोहतक में 25, जींद में 21 और पानीपत में चार महिलाएं ऑटो दौड़ा रही हैं।

रोहतक की महिलाएं तो लोन चुकाकर मालकिन भी बन चुकी हैं। ये संघर्ष और परिश्रम से परिवार का सहारा बन चुकी हैं। अब ये महिला चालक रोज 700 से 1000 रुपए कमाकर अपने परिवार को चला रही हैं। इसी के बलबूते आज वे अपने बच्चों को डॉक्टर, इंजीनियर और आईएएस बनाने का सपना बुन पा रही हैं। इन्होंने उन लोगों को भी गलत साबित कर दिया है, जो कहते थे- दो महीने में ही ऑटो चलाना छोड़ देंगी, कहीं भिड़ा देंगी, छेड़छाड़ और बदनामी होगी। गुलाबी ऑटो के लिए महिलाओं को 2 लाख के ऑटो के लिए करीब 2 लाख रुपए ही चुकाने पड़े, क्योंकि कंपनी और एजेंसी से छूट तो मिली ही, बैंक ने भी रियायत दी। शेष | पेज 13 पर

तस्वीर रोहतक रेलवे स्टेशन पर महिला चालकों के बनाए गए ऑटो स्टैंड की है।

राजेश कौशल | रोहतक

चार साल पहले आठ महिलाओं से शुरू हुई गुलाबी ऑटो मुहिम हरियाणा में सशक्तिकरण, सामाजिक बदलाव और स्वरोजगार का अनूठा उदाहरण बन चुकी है। अब रोहतक में 25, जींद में 21 और पानीपत में चार महिलाएं ऑटो दौड़ा रही हैं।

रोहतक की महिलाएं तो लोन चुकाकर मालकिन भी बन चुकी हैं। ये संघर्ष और परिश्रम से परिवार का सहारा बन चुकी हैं। अब ये महिला चालक रोज 700 से 1000 रुपए कमाकर अपने परिवार को चला रही हैं। इसी के बलबूते आज वे अपने बच्चों को डॉक्टर, इंजीनियर और आईएएस बनाने का सपना बुन पा रही हैं। इन्होंने उन लोगों को भी गलत साबित कर दिया है, जो कहते थे- दो महीने में ही ऑटो चलाना छोड़ देंगी, कहीं भिड़ा देंगी, छेड़छाड़ और बदनामी होगी। गुलाबी ऑटो के लिए महिलाओं को 2 लाख के ऑटो के लिए करीब 2 लाख रुपए ही चुकाने पड़े, क्योंकि कंपनी और एजेंसी से छूट तो मिली ही, बैंक ने भी रियायत दी। शेष | पेज 13 पर

महिला चालकों के लिए अलग स्टैंड, अब ई-रिक्शा अभियान
महिला यात्रियों के लिए रोहतक में 9 अप्रैल 2015 को गुलाबी ऑटो की शुरुआत हुई, पर इनके चालक पुरुष थे। गांधी कैंप निवासी रागिनी गायिका प्रोमिला ने पहली महिला ऑटो ड्राइवर बनने का निर्णय लिया।

पहले चरण में पुलिस ने 8 महिलाओं को ट्रेनिंग दिलवाई। 13 मई 2015 को सभी ऑटो लेकर सड़कों पर उतरीं।

रोहतक रेलवे स्टेशन पर अब महिला ऑटो चालकों का अलग स्टैंड है। अब महिलाएं काले ऑटो भी चला रही हैं।

समाजसेवी राजेश लूंबा टीनू महिलाओं के लिए अब ई-रिक्शा अभियान शुरू कर रहे हैं। महिला दिवस के अवसर पर शुक्रवार से सब्सिडी पर दी जाने वाली इन ई-रिक्शा को चलाने के लिए महिला चालकों का रजिस्ट्रेशन शुरू होगा।

पढ़िए.. ऐसी 4 महिलाओं के संघर्ष की कहानी, जिन्होंने पुरुष प्रधान काम में मुकाम पाया
पति के इलाज व बच्चे पढ़ाने के लिए सिलाई की, शिक्षण संस्थान में काम किया, ऑटो थामा तब बदली जिंदगी

पति के इलाज पर 12 लाख रु. लग गए तो बिगड़ गया घर का सिस्टम, अब बेटी के साथ भाई के बेटे को भी पढ़ा रहीं

सल्लारा मोहल्ला की कमलेश कहती हैं, ‘15 साल से पति को रीढ़ की हड्‌डी की बीमारी है। इलाज में 12 लाख रु. खर्च हो गए तो घर का सिस्टम बिगड़ गया। गहने बेचकर 21 हजार रुपए मार्जिन मनी देकर लोन पर ��ऑटो लिया। इकलौती बेटी काे प्राइवेट स्कूल में डाला। भाई के बेटे को भी पढ़ा रही हूं। रोज 10 घंटे �ऑटो चलाती हूं।’

पति की मौत के बाद 3 बच्चों को पालना चुनौती था, ऑटो की 30 किस्तें भर दीं तो बढ़ गया हौसला

झाड़ू-पोंछा किया, फिर पड़ोसी महिलाओं को देख ऑटो ड्राइवर बनीं तो बदले हालात, बेटे को डॉक्टर बनाना है

संजय नगर निवास पिंकी बताती हैं, ‘पति के निधन के बाद घरों में झाड़ू-पोंछा करने लगी। 2015 में पड़ोसी रीना, मीना व सुमन को गुलाबी �ऑटो चलाता देख ड्राइवर बनने की ठानी। लोन पर �ऑटो खरीदा। इससे घर के हालात बदले। बेटी अंजलि बैंक की कोचिंग ले रही है। बेटे को डॉक्टर बनाने का सपना है।’

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