रिसर्च / जापानी बुखार से देश में 40 साल में 10 हजार मौतें; पहली बार खोजी गई दवा, इसी साल बाजार में आएगी



गुड़गांव के मानेसर में ब्रेन की आकृति वाली बिल्डिंग में ब्रेन रिसर्च इंस्टीट्यूट। गुड़गांव के मानेसर में ब्रेन की आकृति वाली बिल्डिंग में ब्रेन रिसर्च इंस्टीट्यूट।
ब्रेन लाइब्रेरी बनाई जा रही है ब्रेन रिसर्च इंस्टीट्यूट में। ब्रेन लाइब्रेरी बनाई जा रही है ब्रेन रिसर्च इंस्टीट्यूट में।
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गुड़गांव के मानेसर में ब्रेन की आकृति वाली बिल्डिंग में ब्रेन रिसर्च इंस्टीट्यूट।गुड़गांव के मानेसर में ब्रेन की आकृति वाली बिल्डिंग में ब्रेन रिसर्च इंस्टीट्यूट।
ब्रेन लाइब्रेरी बनाई जा रही है ब्रेन रिसर्च इंस्टीट्यूट में।ब्रेन लाइब्रेरी बनाई जा रही है ब्रेन रिसर्च इंस्टीट्यूट में।

  • गुड़गांव के मानेसर में ब्रेन की आकृति वाली बिल्डिंग में ब्रेन रिसर्च इंस्टीट्यूट में 14 वैज्ञानिक, 100 रिसर्चर्स कर रहे शोध
  • मीनोसाइक्लिन है जापानी बुखार में कारगर, लखनऊ के केजीएमयू में क्लीनिकल टेस्ट सफल

Dainik Bhaskar

Jun 04, 2019, 12:25 PM IST

पानीपत (राजेश खोखर). जापानी इंसेफ्लाइटिस यानी जापानी बुखार या फिर दिमागी बुखार। इससे 40 साल में 10 हजार से ज्यादा बच्चों की मौत हो चुकी हैं। अब मानेसर स्थित नेशनल ब्रेन रिसर्च सेंटर (एनबीआरसी) के वैज्ञानिकों ने इसकी दवा ईजाद की है। दवा इसी साल बाजार में आने की उम्मीद है। इंसेफ्लाइटिस का प्रकोप सबसे ज्यादा पूर्वी उत्तर प्रदेश के गोरखपुर व ओडिशा में होता है। इसका वायरस दिमाग में संक्रमण पैदा करता है। सटीक इलाज न होने से डॉक्टरों की आंखों के सामने ही बच्चे दम तोड़ देते हैं। जो बच जाते हैं, वे दिव्यांग हो जाते हैं। नई दवा से जान भी बच सकेगी और बाद के जीवन में भी सुधार आएगा।

15 साल रिसर्च, तब मिली सफलता

  1. एनबीआरसी के वैज्ञानिक डॉ. अनिर्बान बसु और उनकी टीम पिछले 15 साल से रिसर्च कर रही थी। बसु ने बताया कि इंसेफ्लाइटिस के कारणों का पता लगाना बड़ा टास्क था। इसमें समय लगा। इसके बाद 2 बातों का समाधान चाहिए था। पहला इस बीमारी से कैसे जान बचाई जाए। दूसरा जिनकी जान तो बच जाती है, लेकिन वे दिव्यांग हो जाते हैं, उनमें सुधार कैसे लाया जाए। इस पर काफी लंबी रिसर्च चली। कई प्रयासों के बाद ट्रायल सफल हुआ। 

  2. 2016 में एंटीबायटिक मीनोसाइक्लिन का चूहों पर ट्रायल किया गया। इसमें सामने आया कि इस दवा का प्रयोग इस बीमारी में भी हो सकता है। स्थानीय लैब में चूहों पर कई चरण में जांच की सफलता के बाद मनुष्य पर क्लिनिकल ट्रायल लखनऊ केजीएमयू में किया गया, जो सफल रहा। अब सिद्ध हो गया है कि मीनोसाइक्लिन को दिमागी बुखार में भी प्रयोग कर सकते हैं और जान बचा सकते हैं। इतना ही नहीं, जिन बच्चों की जान बच जाती है, उन्हें भी अगर यह दवा दी जाए तो कुछ समय में उनके जीवन में काफी सुधार आ सकता है। सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि मीनोसाइक्लिन की कीमत बहुत ही मामूली है। डॉ. बसु बताते हैं कि हमारा काम पूरा हो चुका है और फाइल केंद्र सरकार व संबंधित विभागों को जा चुकी है। वहां से अप्रूवल मिलते ही इस दवा का नियमित इस्तेमाल होने लगेगा। यूपी सरकार को भी चिट्‌ठी लिखी गई है।

  3. देश की एकमात्र ब्रेन लाइब्रेरी बन रही

    ये है रियल ब्रेन: रिसर्च सेंटर के अंदर आदमी के 10 से 15 साल तक पुराने असली ब्रेन रखे हुए हैं। जिन्हें बॉक्स के अंदर फोमिनल सॉल्यूशन के अंदर रखा जाता है। इन्हें यहां पर नए बच्चों को पढ़ाने और रिसर्च के उद्देश्य से रखा गया है।

  4. ब्रेन टैंपलेट: वैज्ञानिक डॉ. प्रवत मंडल ने देश के अलग-अलग कोने के 150 लोगों का ब्रेन टैंपलेट तैयार किया है। जिससे पता लग सके किस क्षेत्र के लोगों में ब्रेन के अंदर क्या अंतर है। दूसरे देशों के ब्रेन से अपने देश के लोगों के ब्रेन की तुलना भी हाे सकेगी। इसके लिए डॉ. मंडल ने सॉफ्टवेयर भी तैयार किए हैं।

  5. जीका पर शुरुआती सफलता, दुनिया मिलकर खोज रही इलाज

    ब्रेन रिसर्च सेंटर के वैज्ञानिक डॉ. पंकज सेठ और उनकी टीम ने जीका वायरस पर रिसर्च में भी सफलता पाई है। डॉक्टर पंकज बताते हैं कि जीका वायरस डेंगू और चिकनगुनिया की तरह मच्छरों से फैलता है। यह गर्भस्थ बच्चे के ब्रेन पर असर डालता है। इससे पीड़ित बच्चे छोटे आकार के सिर के साथ पैदा होते हैं। लंबे शोध में सामने आया है कि जीका वायरस के ऊपरी हिस्से में ई-प्रोटीन यानी इनवलप प्रोटीन होता है और वही बच्चे के ब्रेन (स्टेम सेल्स, कोशिका) पर सीधा असर डालता है। अब इस जीका के ई-प्रोटीन को खत्म करने पर शोध कार्य चल रहा है। डॉ. सेठ संयुक्त राज्य अमेरिका में राष्ट्रीय स्वास्थ्य संस्थान में डाक्टरेट प्रशिक्षण पूरा करने के बाद 2003 में भारत लौटे और तब से यहां रिसर्च का काम कर रहे हैं। उन्होंने बताया कि रिसर्च टीम में निगम के सीएमओ डॉ. ब्रह्मदीप सिंधु का भी काफी सहयोग रहा है।

  6. डिमेंशिया यानी भूलने की बीमारी: जुटाया जा रहा देश भर से डाटा

    एनबीआरसी के डायरेक्टर प्रो. नीरज जैन ने बताया कि सेंटर पर डिमेंशिया और अल्जाइमर पर भी काम चल रहा है। दोनों ही बीमारियों में आदमी भूलने लगता है। लेकिन इनमें अंतर यह है कि डिमेंशिया मस्तिष्क की विभिन्न बीमारियों से बौद्धिक क्षमताओं की गिरावट का लक्षण है। वहीं अल्जाइमर उन बीमारियों में से एक है। डॉ. मंडल ने शोध में पाया है कि अल्जाइमर क्यों होता है और इसे कैसे दूर कर सकते हैं। डिमेंशिया पर अभी बड़े स्तर पर काम शुरू हुआ है। इस पर डॉ. शिव शर्मा काम कर रहे हैं। डॉ. शिव शर्मा ने बताया कि देश में कितने लोगों को भूलने की बीमारी है और हर वर्ष कितनों को होती है, यह डाटा हम एकत्रित कर रहे हैं। वहीं इस तरह के बीमार आदमियों के ब्लड सैंपल और ब्रेन का डाटा भी एकत्रित कर रहे हैं, जिससे यह पता लगा सकें कि इस बीमारी में ब्रेन के अंदर ‍क्या बदलाव आते हैं। 

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