बाढ़ की सूचना पर मदद करने दिल्ली से सांपला आए थे हंसराज
कर्नाटक के पूर्व राज्यपाल व पूर्व केंद्रीय कानून मंत्री हंसराज भारद्वाज के निधन की खबर मिलने के बाद गांव गढ़ी-सापंला में मातम पसर गया। गांव में होली पूर्व की चमक फीकी पड़ गई। वहीं परिजनों को ढांढस देने क्षेत्र के लोग उनके दिल्ली आवास तो कुछ ग्रामीण गांव स्थित उनकी पैतृक घर पर पहुंचे और उनसे जुड़ी यादों को याद करते दिखाई दिए। करीब 82 वर्षीय हंसराज का रविवार शाम करीब साढ़े 6 बजे दिल्ली के साकेत स्थित एक निजी अस्पताल में निधन हो गया। उन्हें गुर्दे संबंधी बीमारी के चलते अस्पताल में भर्ती करवा गया था। सोमवार को दिल्ली स्थित निगमबोध घाट पर अंतिम संस्कार किया गया। चाचा राजेंद्र भारद्वाज ने बताया कि 1995 में पूरा क्षेत्र बाढ़ की चपेट में आ गया था। उस समय ग्रामीण घरों में कैद होकर रह गए। जिस कारण रोजमर्रा का जरूरी सामान मिलना मुश्किल हो गया। गांव में आवागमन के लिए महज एक संकरा रास्ता बचा था। इस बात की जानकारी मिलने के बाद दिल्ली से हंसराज गांव अपने साथ खाद्य सामग्री के अलावा अन्य जरूरी सामान लेकर पहुंचे और ग्रामीणों की मदद की। वहीं गांव में बनी 52 बाई 27 की कोठी को भी ग्रामीण शादी विवाह जैसे कार्यक्रमों में इस्तेमाल करते हैं। हालांकि गांव में करीब सवा एकड़ जमीन भी है, जिसको पारिवारिक सदस्य खेती बाड़ी कार्यों के लिए इस्तेमाल करते है।
कई किताबें लिखीं
अपने व्यस्ता के बावजूद भी पूर्व कानून मंत्री ने कई किताबें लिखीं। जिसमें प्रमुख सोल ऑफ इंडिया, ए फैलोशिप ऑफ फेथ काफी चर्चित रही। कानून मंत्री के पद पर रहते हुए रोहतक बार काउंसिल की ओर से लाइफ टाइम मेंबर शिप दी गई थी।
जीवन सादगी से भरा था: ग्रामीण हेमंत भारद्वाज, अमित भारद्वाज, रामबीर दहिया, दिनेश, सतीश भारद्वाज, दिपांशु, रोहित, आकाश, फूलकुमार, नवनीत,दक्ष आदि का कहना है कि उनका जीवन सादगी से भरा था। जब भी गांव में आने का मौका मिला वे चले आए। गांव आकर खाट (चारपाई) पर बैठकर बातचीत करना ज्यादा पंसद रहा।
पिता उच्च अधिकारी रहे
हंसराज के चचेरे भाई सतीश ने बताया कि पूर्व कानून मंत्री के पिता पंडित जगन्नाथ भारद्वाज दिल्ली पुलिस में उच्च अधिकारी रहे। जिस जिसके चलते करीब 45-50 साल पहले वे दिल्ली शिफ्ट हो गए थे।
पैदल स्कूल जाते थे
राज्यपाल व कानून मंत्री तक का सफर तय करने वाले हंसराज की करीब 92 वर्षीय चाची लक्ष्मी देवी ने बताया कि उनकी प्राथमिक शिक्षा गांव के ही राजकीय स्कूल में हुई। वे पैदल ही स्कूल जाते थे।