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हेमंत-बसंत त्रतु का योग है ये होली : स्वामी चंद्रवेश

एक वर्ष पहले
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स्वामी इंद्रवेश विद्यापीठ आश्रम टिटौली में चल रहे 13वें बेटी बचाओ महायज्ञ में सोमवार को होली पर्व वैदिक रीति से मनाया गया। शिक्षा विभाग पंचकूला से सह निदेशक दिलबाग सिंह अहलावत, कुश्ती संघ हरियाणा के सचिव राजकुमार हुड्डा, प्राथमिक शिक्षक संघ रोहतक के प्रधान रामराज कादियान, फरीदाबाद के तहसीलदार नवदीप राठी, नोएडा से वैदिक विद्वान डॉ. मुमुक्षु आर्य ने आर्यजनों के साथ यज्ञ में आहुति डाली। यज्ञ में मुख्य यज्ञमान अजय कुंडू व प्रीति आर्या, अजय व ऋतु, धर्मदेव व रीना, राजबीर मलिक व प्रोमिला, संजय व निर्मला, दीपक व प्रीति, राजबीर वशिष्ठ व कमला, प्रो.उर्मिल राठी,धर्मपाल व सुमन, देवी सिंह व पूनम, राजेन्द्र व ओमपति ने यज्ञमान बनकर आहुतियां डाली। प्रवेश आर्या ने बताया कि यह यज्ञ 15 मार्च तक चलेगा।

अधजले अन्न को कहते हैं होलक : महायज्ञ के ब्रह्ना व वैदिक विद्वान स्वामी चंद्रवेश ने बताया कि अधजले अन्न को होलक कहते हैं। इसी कारण इस पर्व का नाम होलिकोत्सव है और बसंत ऋतुओं में नए अन्न से यज्ञ (येष्ट) करते हैं। इसलिए इस पर्व का नाम वासंती नव सस्येष्टि है। दूसरा नाम नव संवत्सर है। मानव सृष्टि के आदि से आर्यों की यह परंपरा रही है कि वह नवान्न को सर्वप्रथम अग्निदेव को समर्पित करते थे। तत्पश्चात स्वयं भोग करते थे। हमारा कृषि वर्ग दो भागों में बंटा है वैशाखी ओर कार्तिकी। इसी को वासंती और शारदीय एवं रबी व खरीफ की फसल कहते हैं। फाल्गुन पूर्णमासी वासन्ती फसल का आरम्भ है। उन्होंने कहा कि आर्यों में चातुर्य्यमास यज्ञ की परम्परा है। वेदज्ञों ने चातुर्य्यमास यज्ञ को वर्ष में तीन समय निश्चित किए हैं। आषाढ़ मास, कार्तिक मास (दीपावली), फाल्गुन मास (होली)। ऋतुओं के मिलने पर रोग उत्पन्न होने के खतरे से बचने व उनके निवारण के लिए यह यज्ञ किए जाते थे। यह होली हेमंत और बसंत ऋतु का योग है। रोग निवारण के लिए यज्ञ ही सर्वोत्तम साधन है। प्राचीनतम वैदिक परम्परा के आधार पर होली नवान्न वर्ष का प्रतीक है।

टिटौली में चल रहे बेटी बचाओ महायज्ञ में आहुति डालते हुए।
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