वेदों की अलख जगाने के लिए तीन जीवनदानी संन्यासी बने
स्वामी इंद्रवेश के 83वें जन्मोत्सव पर 3 आर्य समाजियों ने जीवनदानी संन्यासियोंे के रूप में दीक्षा ली। उन्होंने जीवनपर्यंत वेदों में वर्णित सत्य का प्रचार अौर झूठ-पाखंड, भ्रूण हत्या, भ्रष्टाचार मिटाने के लिए समाज में अलख जगाने का प्रण लिया। स्वामी इंद्रवेश विद्यापीठ टिटौली में चल रहे 13वें बेटी बचाओ महायज्ञ में शुक्रवार को सार्वदेशिक आर्य प्रतिनिधि सभा नई दिल्ली के प्रधान स्वामी आर्यवेश ने इन तीनों आर्य संतों को संन्यास की दीक्षा दिलाई। स्वामी चंद्रवेश दीक्षा के आचार्य रहे। इस दौरान सत्यपाल शर्मा को स्वामी अात्मानंद, रामचंद्र को स्वामी मुनीश्वरानंद और सुरेंद्र सिंह को आर्य स्वामी देवानंद नाम से दीक्षित किया गया। इनमें से दो आर्य संन्यासी गृहस्थ आश्रम से आए तो वहीं एक संत बचपन से ही साधु जीवन व्यतीत कर रहे हैं।
स्वामी देवानंद : 12 वर्ष पहले घर छोड़ा, अब बने आर्य संन्यासी: उत्तरप्रदेश के अलीगढ़ निवासी 80 वर्षीय स्वामी देवानंद 12 वर्ष की उम्र से आर्य समाज से जुड़ गए थे। गृहस्थ जीवन में रहते हुए उन्होंने तमाम आंदोलनों व अभियान में अपनी भूमिका निभाई। जीवनपायन के लिए खेती करते रहे। 12 वर्ष पहले वे वानप्रस्थी बने, लेकिन अब आर्य संन्यासी बनकर वेद प्रचार करेंगे। उनका लक्ष्य युवाओं काे संस्कारित बनाना है। इसके लिए वे देशभर में जागरूकता अभियान चलाएंगे। उन्होंने कहा कि संस्कारहीन व्यक्ति का जीवन की सामान्य चुनौतियों में भी हौसला टूट जाता है।
स्वामी मुनीश्वरानंद : बचपन में ही साधु बने, अब दिखाएंगे दूसरों को राह : उत्तराखंड के बद्री नारायण निवासी 36 वर्षीय स्वामी मुनीश्वरानंद बचपन से ही साधु जीवन व्यतीत कर रहे हैं। कुछ माह पहले वे आर्य समाज के आंदोलनों के बीच आर्य संन्यासियों व संतों से जुड़े। उनकी विचारधारा से प्रभावित होकर उन्होंने आर्य समाज के लिए जीवनदानी संन्यासी के रूप में सेवा का अखंड व्रत लिया है। कहते हैं कि सुख-शांति की तलाश में भटकते लोगों की चाह वैदिक जीवन जीने से ही पूरी होगी। इसके लिए वे समाज में जागरूकता अभियान चलाएंगे। उन्हें आर्य ग्रंथों, विचारों व दर्शन से जोड़ेंगे।
स्वामी आत्मानंद : पहले खेती करते थे, अब करेंगे प्रचार : उत्तरप्रदेश के अलीगढ़ निवासी 58 वर्षीय स्वामी अात्मानंद गृहस्थ जीवन से आए हैं। वे खेती करते थे। ऋषि दयानंद के चिंतन-सिद्धांत से प्रेरित होकर उन्होंने संन्यासी बनकर आर्य समाज की सेवा का प्रण लिया है। उनका लक्ष्य समाज को झूठ व पाखंड से बचाना है। इसके लिए वे निरंतर वेदों के सत्य प्रचार का अभियान चलाएंगे ताकि समाज को नई दिशा मिल सके। उन्होंने कहा कि आज भौतिक संसाधनों में उलझकर मानव अस्तित्व खो रहा है। मनुष्य की इस दुर्गति से मात्र ऋषि दयानंद की जीवनधारा ही बचा सकती है।
दो संन्यासियों ने गृहस्थ जीवन को त्याग कर अब आर्य समाज की राह चुनी, एक बचपन से ही बन गए थे साधु
वैदिक विरक्त मंडल में देशभर में 500 आर्य संन्यासी
आर्य समाज में वैदिक विरक्त मंडल है। इसमें राष्ट्रीय स्तर पर 500 आर्य संन्यासी हैं। स्वामी प्रणवानंद इसके प्रधान हैं। हरियाणा में 50 जीवनदानी संन्यासी हैं। शुक्रवार को इसमें तीन श्रेष्ठ नाम और जुड़ गए हैं। राष्ट्रीय व अंतरराष्ट्रीय स्तर पर आर्य समाज की ओर से चलाए जाने वाले कार्यक्रमों की सफलता में जीवनदानी संन्यासियों की निर्णायक भूमिका होती है। ये संन्यासी गांव-गांव भ्रमण करके लोगों को प्रेरित करते हैं। संगठन बनाते हैं और आंदोलनों का नेतृत्व भी करते हैं।
- स्वामी आर्यवेश, महामंत्री, वैदिक विरक्त मंडल।