फरीदाबाद / ब्रिटिश राज में रियासतों ने बना रखे थे अपने बांट-माप; सूरजकुंड मेले में देखने को मिलेंगे छटांक, सेर, दो सेर, पनसेरा और मण

यह रतलाम रियासत का बांट था। यह रतलाम रियासत का बांट था।
आगरा रियासत का बांट। आगरा रियासत का बांट।
कैथल रियासत का बांट। कैथल रियासत का बांट।
रियासतों ने अपनी सुविधा अनुसार बांट  बना रखे थे। रियासतों ने अपनी सुविधा अनुसार बांट बना रखे थे।
सूरजकुंड में लगे स्टॉल के अंदर रखे बांट। सूरजकुंड में लगे स्टॉल के अंदर रखे बांट।
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यह रतलाम रियासत का बांट था।यह रतलाम रियासत का बांट था।
आगरा रियासत का बांट।आगरा रियासत का बांट।
कैथल रियासत का बांट।कैथल रियासत का बांट।
रियासतों ने अपनी सुविधा अनुसार बांट  बना रखे थे।रियासतों ने अपनी सुविधा अनुसार बांट बना रखे थे।
सूरजकुंड में लगे स्टॉल के अंदर रखे बांट।सूरजकुंड में लगे स्टॉल के अंदर रखे बांट।

  • सूरजकुंड मेले में कुरुक्षेत्र यूनिवर्सिटी के लेक्चरर 250 पुराने बांट का संकलन लेकर पहुंचे
  • रतलाम, संगरूर, जबलपुर, कैथल, जींद और पटियाला रियासत के बांट किए संकलित

दैनिक भास्कर

Feb 04, 2020, 02:02 PM IST
फरीदाबाद (मनोज कौशिक). कच्चे घड़े और पक्के घड़े के बारे में तो आपने सुना होगा लेकिन कच्चे धड़े और पक्के धड़े के बारे कुछ ही लोगों ने सुना होगा। युवा पीढ़ी को तो छटांक, सेर, दो सेर, पनसेरा और मण के बारे भी नहीं पता होगा। दरअसल, ये हमारी प्राचीन माप-तोल प्रणाली के शब्द हैं। फरीदाबाद के सूरजकुंड मेले में आप इनके बारे में जान सकते हैं। हरियाणा की कुरुक्षेत्र यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर महासिंह पूनिया ब्रिटिश राज के पुराने बांट लेकर पहुंचे हैं। उन्होंने देशभर से पुराने 250 बाट संकलित किए हैं। 

पहले पत्थर और ईंट से तोला जाता था सामान

पूनिया के पास रतलाम रियासत, संगरूर रियासत, जबलपुर रियासत, कैथल रियासत, जींद रियासत और पटियाला रियासत के बांट हैं। डॉ. पूनिया बताते हैं कि ब्रिटिश राज से पहले माप-तोल के लिए पत्थर इस्तेमाल होते थे। हालांकि हमारी माप-तोल प्रणाली कई सौ साल पुरानी है लेकिन बांट का प्रचलन बाद में आया। पहले बांट पर कोई मार्का नहीं होता था, लोहे के प्लेन टुकड़े को ढाल दिया जाता था। उसके वजन के मुताबिक बांट निर्धारित कर दिया जाता था। बाद में मार्के वाले बांट आए। अलग-अलग रियासतों ने अपने-अपने बांट बनाए।

रियासतों के बांट पर उनकी रियासत का नाम, बांट का वजन, उसका सन् अंकित होता था। अलग-अलग रियासतों ने अपनी सुविधा अनुसार इन्हें डिजाइन करवाया था। कुछ बांट हिंदी में तो कुछ उर्दू में बनाए गए थे। इसके अलावा स्थानीय भाषाओं में भी बांट बनाए गए थे। इसी दौरान कच्चा धड़ा और पक्का धड़ा बनाया गया। कच्चे धड़े पर कोई मार्का नहीं होता था। पक्के धड़े पर मार्का अंकित होता था। 

  • रत्ती - 0.121225 ग्राम के बराबर होता है।
  • माशा -  0.97 ग्राम
  • तोला - 11.67 ग्राम
  • सेर - 933 ग्राम
  • पनसेरी - 4.677 किलोग्राम
  • मण - 8 पनसेरी के बराबर

डॉ. महासिंह पूनिया ने अपने प्रयासों से कुरुक्षेत्र यूनिवर्सिटी में हरियाणवी प्राचीन संस्कृति और धरोहर को संजो कर रखा है। पुराने हरियाणवी औजार, वाद्ययंत्र, वेषभूषा और अन्य सांस्कृतिक धरोहर को अलग-अलग हिस्सों से जुटाकर संकलित किया है। पुराने बांट भी इसी कड़ी में संकलित किए, जो 250 हो गए हैं, वे इसे आगे भी जुटाने में प्रयासरत हैं। 

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