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वीसी बोले-42 साल फौज में नौकरी की, टारगेट ओरिंटेड हूं, मन नहीं लगा तो इस्तीफा दिया, बाबा ने कहा-कर्मचारी तो आते-जाते रहते हैं

बाबा मस्तनाथ विश्वविद्यालय में छह माह के अंदर ही वीसी मेजर जनरल रिटायर्ड राजेंद्र सिंह यादव ने अपने पद से इस्तीफा...

Dainik Bhaskar

Nov 11, 2018, 03:46 AM IST
Rohtak - vc bole 42 years of service in the army i am oriented to target i did not feel like i resigned baba said employees come and go
बाबा मस्तनाथ विश्वविद्यालय में छह माह के अंदर ही वीसी मेजर जनरल रिटायर्ड राजेंद्र सिंह यादव ने अपने पद से इस्तीफा दे दिया। इस्तीफा देने के बाद उन्होंने कहा कि मैंने 42 साल फौज की नौकरी की। अपनी भी पर्सनल वैल्यू है। उसी रास्ते से काम करना पसंद करता हूं। छह महीने में बदलाव लाने की कोशिश भी की, लेकिन दिल नहीं लगा तो कुलपति पद से इस्तीफा दे दिया। वहीं, विश्वविद्यालय के कुलाधिपति बाबा बालकनाथ ने पहले तो कहा कि वे लंबी छु‌ट्‌टी पर गए हैं, लेकिन बाद में स्वीकार कर लिया कि वे इस्तीफा दे चुके हैं। उन्होंने कहा कि कर्मचारी तो आते-जाते रहते हैं।

बाबा बालकनाथ के महंत बनने के बाद वीसी आहूजा चले गए थे

2017 में महंत चांदनाथ के बाद बाबा बालकनाथ ने गद्दी को संभाला। इसके बाद वीसी डॉ. मार्कंडेय आहूजा की जगह 30 अप्रैल 2018 को राजेंद्र सिंह यादव ने बाबा मस्तनाथ विश्वविद्यालय के कुलपति पद का कार्यभार ग्रहण किया था। ठीक 6 माह बाद ही 31 अक्टूबर को अपना इस्तीफा बाबा बालकनाथ को सौंप दिया, लेकिन उनका इस्तीफा स्वीकार नहीं किया गया। हालांकि 3 नवंबर को बाबा बालकनाथ ने उनका इस्तीफा स्वीकार कर लिया। फिर भी दीपावली तक रुकने को कहा।

किसी से कोई मनमुटाव नहीं : यादव

राजेंद्र सिंह यादव ने कहा कि मैं लंबी छुट्टी पर नहीं गया हूं, बल्कि मैंने 31 अक्टूबर को ही बाबा मस्तनाथ विश्वविद्यालय के कुलपति पद से इस्तीफा दे दिया था, जिसे 3 नवंबर को बाबा बालकनाथ ने स्वीकार कर लिया, लेकिन उन्होंने मुझे दीपावली तक रुकने को कहा। इस वजह से मैं रोहतक रुका रहा। बाबा बालकनाथ के साथ खाना खाया, लेकिन दीपावली बीतने के बाद 9 नवंबर को मैं अपने गुरुग्राम स्थित घर चला आया हूं। अब अगले तीन महीने तक पूरी तौर पर विश्राम करूंगा। बाद में अपनी अगली पारी सोच विचार के बाद शुरू करूंगा। इस्तीफा की वजह किसी से भी मनमुटाव नहीं है। फौजी कल्चर से टारगेट ओरिएंटिड काम करने की आदत है। वहां तक नहीं पहुंचा तो मन हटने लगा। मैं दिल से यहां आया था कि संस्थान को ऊंचाई तक पहुंचाऊंगा।

छुट्‌टी की कहकर गए थे


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