फूड हिस्ट्री / शतरंज में हार से उपजी थी पायसम!



food history by chef harpal singh sokhi- story of kheer/paysam
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food history by chef harpal singh sokhi- story of kheer/paysam

Dainik Bhaskar

Feb 24, 2019, 12:23 PM IST

हेल्थ डेस्क. हममें से शायद ही कोई ऐसा होगा जिसे खीर पसंद नहीं होगी। देश के अलग-अलग हिस्सों में इसे अलग-अलग नामों से जाना जाता है, जैसे दक्षिण भारत में इसे पायसम या पायसा कहा जाता है। इसे कहीं दूध में चावल डालकर बनाया जाता है, कही सेवइयां डालकर तो कुछ लोग इसमें साबूदाना मिलाकर बनाते हैं। 


देश के अलग-अलग हिस्सों में खीर को बनाने के मौके भी अलग-अलग होते हैं। कई लोग तीज-त्योहारों पर इसे बनाते हैं। कई मंदिरों में यह प्रसाद के तौर पर बनती है। हिंदू परिवारों में बच्चे के अन्नप्राशन के संस्कार में खीर बनाई जाती है। हवन के दौरान भी दूध, चावल और घी वाली खीर बनाने की परंपरा है। तो मुस्लिम सम्प्रदाय के लोग मीठी ईद के दिन सेवइयां वाली खीर अनिवार्य रूप से बनाते हैं, जिसमें कई तरह के ड्राय फ्रूट्स डले होते हैं। मुगलों के काल में इसका एक और संशोधित संस्करण सामने आया- फिरनी। इसमें चावल को दूध में अच्छी तरह से फेंटकर सूखे मेवों के साथ पेश किया जाता है। 

 

शतरंज में हराकर तोड़ा राजा का घमंड
खीर या पायसम कैसे अस्तित्व में आई, इसको लेकर कई तरह की रोचक कहानियां मौजूद है। पायसम को लेकर सबसे मजेदार कहानी दक्षिण भारत में मिलती है। मान्यता है कि केरल के अम्बलपुझा(अलप्पुझा) में 16वीं सदी के आसपास एक राजा राज करता था। नाम था देवनारायण तामपुरण। वह शतरंज का चैम्पियन था। उसे कोई हरा नहीं पाता था। उसे इस बात का इतना घमंड था कि एक बार उसने घोषणा कर दी कि शतरंज में उसे जो भी हरा देगा, उसे वह मुंहमांगा ईनाम देगा। भगवान कृष्ण ने उसके इस घमंड को तोड़ने के लिए एक लड़के का वेश धरा और उसे शतरंज की चुनौती दी। अब कृष्ण तो कृष्ण थे। एक बार हराया। फिर दोबारा मौका दिया। दूसरी बार भी हरा दिया। अब राजा के पास कोई चारा नहीं था। उसने कृष्ण के वेश में आए उस बालक से मुंहमांगा ईनाम मांगने को कहा। तब कृष्ण ने कहा कि उन्हें चेस बोर्ड के 64 स्क्वेयर में रखे चावल के दानों के बराबर चावल चाहिए। शर्त यह थी कि हर स्क्वेयर में रखे चावल के दाने अगले स्क्वेयर में दोगुने हो जाएंगे। यानी पहले स्क्वेयर में एक दाना तो दूसरे स्क्वेयर में दो दाने, तीसरे स्क्वेयर में चार दाने, चौथे स्क्वेयर में 8 दाने, पांचवे स्क्वेयर में 16 दाने। ऐसे ही यह क्रम चलता रहेगा।

 

राजा ने बगैर सोचे-समझे कृष्ण की यह मांग मान ली। लेकिन यह चावल इतना हो गया कि राजा का पूरा भंडार खाली हो गया। आस-पड़ोस से चावल मंगाए, लेकिन तब भी पूर्ति नहीं हो पाई। राजा घबरा गया। तब कृष्ण असली रूप में आए। उन्हें देखकर राजा ने अपने घमंड के लिए माफी मांगी। तब कृष्ण ने उनसे कहा कि वे उनकी मांग को किस्तों में पूरी कर सकते हैं। इसके बाद वहां कृष्ण का मंदिर बनाया गया और हर दिन पायसम(खीर) का प्रसाद चढ़ाया जाने लगा। यह परंपरा आज भी जारी है।

 

वैसे खीर का कोई लिखित इतिहास नहीं है। बस इसको लेकर तरह-तरह की मान्यताएं ही है। एक मान्यता ओडिसाा के पुरी मंदिर से भी जुड़ी है। माना जाता है कि करीब दो हजार साल पहले भगवान जगन्नाथ को खुश करने के लिए खीर बनाई गई थी। और तभी से खीर बनाई जा रही है।  

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