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फूड / तमिलनाडु के कुंभकोणम स्थित उप्पिलीअप्पन मंदिर का नमकरहित प्रसाद- तायिर सादम और सुदंल



Food history by harpal singh sokhi- story of saltless prasad of uppiliappan temple tamilnadu
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Food history by harpal singh sokhi- story of saltless prasad of uppiliappan temple tamilnadu

Dainik Bhaskar

May 05, 2019, 12:03 PM IST

हेल्थ डेस्क. नमक के बिना भोजन की कल्पना नहीं कर सकते। लेकिन तमिलनाडु के कुंभकोणम स्थित उप्पिलीअप्पन मंदिर में नमक रहित प्रसाद का ही भोग लगता है। उप्पिलीअप्पन का यह मंदिर आठवीं सदी में उस दौर का है, जब दक्षिण में चोल शासकों का शासन हुआ करता था। यहां भगवान विष्णु के रूप में वेंकटेश्वर की पूजा की जाती है जिनके बारे में मान्यता है कि उन्हें बगैर नमक का भोजन ही प्रिय है। 

कर्ड राइस का तमिल वर्जन- तायिर सादम
बगैर नमक के प्रसाद के तौर पर यहां "तायिर सादम" बनाया जाता है। कर्ड राइस का ही तमिल वर्जन है तायिर सादम। इसे बनाने के लिए दही और चावल को राई, चना दाल और कड़ी पत्तों के साथ छौंक लगाई जाती है। तायिर सादम के अलावा यहां सुंदल का भी भाेग लगता है। यह बगैर नमक का चने का सलाद होता है। इसके लिए उबले हुए चने में उड़द की दाल, सरसों, सूखी लाल मिर्च, हल्दी और कड़ी पत्ते का बघार लगाया जाता है। इसमें ऊपर से कीसा हुआ खोपरा मिलाया जाता है। तीसरा नमक रहित प्रसाद है वडा। 

 

क्यों लगाया जाता है नमकरहित प्रसाद का भोग
आखिर यहां का प्रसाद नमक से रहित क्यों होता है? इसके पीछे ब्रह्माण्ड पुराण की एक कथा है। इसके अनुसार भूमि देवी ने एक दिन विष्णु से शिकायत की कि उनमें भी वे सारे गुण हैं जो महालक्ष्मी में हैं। इसके बाद भी उन्हें विष्णु अपने दिल में जगह क्यों नहीं दे रहे? इस पर भगवान विष्णु ने कहा कि इसके लिए उन्हें महर्षि मार्कण्डेय की पुत्री के तौर पर जन्म लेना होगा और उस जन्म में उनका नाम 'तुलसी' होगा। वे तुलसी के रूप में ही उन्हें अंगीकार करेंगे। उधर, महर्षि मार्कण्डेय ने महालक्ष्मी जैसी पुत्री की चाह में लंबी तपस्या की। तपस्या के बाद उन्हें जंगल में नवजात शिशु कन्या की प्राप्ति हुई। महर्षि मार्कण्डेय उसे अपनी तपस्या का फल मानकर अपने घर ले आए और महालक्ष्मी के रूप में उसका लालन-पालन करने लगे। उन्होंने उसका नाम रखा तुलसी।

जब तुलसी विवाहयोग्य हो गईं तो उसी दौरान भगवान विष्णु 'पेरुमल' नामक वृद्ध के रूप में महर्षि मार्कण्डेय से मिले और उनसे तुलसी का हाथ मांगा। महर्षि मार्कण्डेय ने वृद्ध बने विष्णु को यह बहाना बनाते हुए अपनी पुत्री का हाथ देने से मना कर दिया कि उसे तो इतना भी नहीं आता कि खाने में कितना नमक मिलाते हैं। इस पर वृद्ध रूपी विष्णु ने कहा कि वे बिना नमक का भी भोजन खा लेंगे, लेकिन विवाह आपकी कन्या से ही करेंगे। जब वृद्ध बार-बार अपनी बात पर अड़े रहे तो महर्षि मार्कण्डेय भी समझ गए कि ये भगवान विष्णु ही हैं और वे खुशी-खुशी अपनी पुत्री का विवाह भगवान विष्णु से करने को राजी हो गए। 

चूंकि भगवान विष्णु रूपी पेरुमल नमक रहित भोजन ग्रहण करने को तैयार हो गए तो उनकी उप्पिलीअप्पन के रूप में पूजा की जाने लगी। तमिल में नमक को 'उप्पू' कहा जाता है। इस तरह भूमि देवी, तुलसी के रूप में विष्णु के दिल में जगह बनाने में कामयाब हुईं। इसीलिए पेरुमल मंदिरों में भगवान वेंकटेश्वर (विष्णु) को तुलसी की माला अर्पित की जाती है। 

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