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  • In The Twelfth And Thirteenth Centuries The Dargah Of Sufi Saints Was The Tradition Of Mass Food, For The First Time Guru Nanak Devji Started The Langar In Kartarpur

सूफी संतों की दरगाह पर थी सामूहिक भोजन की परंपरा, करतारपुर में पहली बार गुरु नानक देव जी ने शुरू किया लंगर

2 वर्ष पहले
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1) अकबर ने गुरु नानक जी से मिलने से पहले आम लोगों की तरह खाया था लंगर 

यूं तो लंगर फारसी भाषा का शब्द है। इसका शाब्दिक अर्थ है दान-धर्म का स्थान या गरीबों-जरूरतमंदों के लिए आश्रयस्थल। व्यापक अर्थों में एक सार्वजनिक रसोई, जहां लोग भोजन कर सकें। कुछ विद्वान लंगर को संस्कृत का शब्द भी मानते हैं। हालांकि फ़ारसी शब्द के साथ फारसियों की संस्कृति और परंपरा में भी लंगर है। बारहवीं और तेरहवीं शताब्दी में सूफी संतों की दरगाह पर लंगर की परंपरा थी। कुछ जगह तो आज भी दरगाहों पर गरीबों के लिए भोजन की व्यवस्था रहती है। सिखों में गुरु का लंगर की परंपरा गुरु नानक देव जी ने करतारपुर साहिब (पाकिस्तान) से शुरू की थी। एक बार गुरु नानक जी के पिता ने उन्हें कुछ पैसे देकर मुनाफा कमाने के लिए कहा। नानक जी ने मुनाफा कमाने के बजाय किसी जरूरतमंद को पैसे दान कर दिए। 

दान की यह परंपरा वहीं से शुरू हुई। गुरु नानक जी और उनके बाद के गुरुओं ने सामाजिक सुधार के लिए लंगर की व्यवस्था को बढ़ावा दिया। गुरु नानक जी के बाद दूसरे गुरु अंगद देव जी ने खदूर साहिब में लंगर शुरू किया। खासकर उनकी पत्नी माता खिवी ने लंगर को संस्थागत रूप दिया। मुगल सम्राट अकबर सिखों के तीसरे गुरु अमर दास जी से मिलना चाहते थे। लेकिन गुरु अमर दास जी ने नियम बनाया था कि जो भी व्यक्ति उनके दर्शन करना चाहता है, पहले उसे लंगर में प्रसाद खाना पड़ेगा। इसी नियम का पालन करते हुए खुद अकबर ने भी गुरु जी से मिलने के पहले आम लोगों की तरह लंगर में बैठकर सादा भोजन किया। 

गुरु अमर दास का गोइंदवाल लंगर चौबीसों घंटे खुला रहता था। यहां लंगर की व्यवस्था देखकर अकबर बहुत प्रसन्न हुए और उन्होंने गुरु जी को भेंट रूप में अपनी जागीर का कुछ हिस्सा देने का प्रस्ताव किया। लेकिन अमर दास जी ने इसे स्वीकार नहीं किया। बाद में अकबर ने अमर दास जी की बेटी की शादी में भेंट के रूप में वह जागीर दान की। कहा जाता है कि वही जगह आज का अमृतसर है। एक बार दसवें गुरु गोबिंद सिंह जी एक आम आदमी की वेशभूषा में आनंदपुर के लंगर पहुंचे। उन्होंने देखा कि भाई नंद लाल का लंगर बहुत अच्छा और बेहतर तरीके से चलाया जा रहा है। उन्होंने दूसरे गुरुद्वारों में भी आनंदपुर की तरह ही लंगर की व्यवस्था लागू करने को कहा। 

महाराजा रणजीत सिंह ने गुरुद्वारों में लंगर के विधिवत संचालन और प्रबंधन के लिए आर्थिक मदद हेतु जागीरों की व्यवस्था की थी। दूसरे सिख शासकों ने भी लंगरों की मदद के लिए आर्थिक मदद की। मौजूदा समय में भी हर गुरुद्वारे में लंगर की परंपरा चली आ रही है। लंगर में कुछ बातों का विशेष ख्याल रखा जाता है। यहां हमेशा शाकाहारी और सात्विक भोजन परोसा जाता है। यहां साफ-सफाई का भी खास ध्यान रखा जाता है। साथ ही भोजन जूठा नहीं होना चाहिए। अपनी स्वेच्छा से सेवादार लंगर में सेवा करते हैं। यह सामुदायिक रसोई है और कोई भी अपने-अपने तरीके से यहां सेवा कर सकता है।

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