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फूड हिस्ट्री / बादाम को चावल और पिश्ते को दाल के आकार में काटकर बनी थी वाजिद अली शाह के लिए शाही खिचड़ी



Story of Khichdi by Chef Harpal Singh Sokhi
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Story of Khichdi by Chef Harpal Singh Sokhi

Dainik Bhaskar

Jan 13, 2019, 11:39 AM IST

हेल्थ डेस्क. देश के अलग-अलग हिस्सों में मकर संक्रांति का पर्व अलग-अलग तरह से मनाया जाता है। मध्य, पश्चिम और उत्तर भारत के कई हिस्सों में इस दिन खासतौर पर खिचड़ी बनाई और खाई जाती है। वैसे खिचड़ी पूरे भारत में लोकप्रिय है और इसके स्वास्थ्य संबंधी गुणों के कारण कुछ लोग तो सप्ताह में कई बार इसे खाते हैं। जैसे प्रदेश बदल जाने पर पानी बदल जाता है, वैसे ही खिचड़ी बनाने का तरीका और स्वाद में भी अंतर आ जाता है। आज इसी खास व्यंजन खिचड़ी के बारे में बता रहे हैं शेफ हरपाल सिंह सोखी...


हमारे यहां खिचड़ी सदियों से खाई जाती रही है। लेकिन आज से करीब 1800 साल पहले लिखे एक ग्रंथ में इसका उल्लेख मिलता है। दूसरी सदी के एक ग्रंथ 'कमिका अगामा' के छठे अध्याय में कई डिशेज और उन्हें बनाने के तरीकों का वर्णन किया गया है। इसी अध्याय में 'क्रूसरन्न' का उल्लेख है जिसे आज की खिचड़ी माना जा सकता है। क्रूसरन्न मूंग की दाल, चावल, तिल के दानों, काली मिर्च और नमक डालकर बनाई जाती थी। क्रूसरन्न के अलावा भी खिचड़ी के दो अन्य रूपों 'मुदगन्न'और 'हरिद्रन्न' का उल्लेख मिलता है। मुदगन्न बहुत ही साधारण तरीके से मूंग दाल और चावल से बनाई जाती थी, जबकि हरिद्रन्न बनाने में चावल, काली मिर्च, हल्दी, जीरा और राई का इस्तेमाल किया जाता था। 

 

अमीर-गरीब सबकी पसंद


दिल्ली के अंतिम हिंदू शासक पृथ्वीराज चौहान के शासनकाल (1166-1192) के दौरान एक दरबारी कवि खिचड़ी जैसी एक डिश का उल्लेख करते हुए कहता है कि इसे गरीब से लेकर अमीर तक सभी खाते थे। अमीर लोग खिचड़ी में घी और अन्य सब्जियां मिलाते थे, जबकि गरीब बगैर घी के ही खाते थे। अल-बरुनी ने किताब-उल-हिंद में खिचड़ी को सर्वप्रिय बताया है। 14वीं सदी में मोरक्को से भारत आए यात्री और विद्वान इब्न बतूता ने भी खिचड़ी का वर्णन करते हुए लिखा है- 'इस दौर में लोग नाश्ते में मूंग दाल और चावल से बनी एक चीज खाते थे जिसमें ऊपर से ढेर सारा घी डाला जाता था।' 

 

जहांगीर को पसंद थी गुजरात की बाजरा खिचड़ी


सोलहवीं सदी में अकबर के दरबारी इतिहासकार अबुल फजल लिखते हैं कि जहांगीर खासकर गुजरात की बाजरा खिचड़ी खाने का काफी शौकीन था। फजल लिखते हैं कि जिस दिन जहांगीर को मांस नहीं खाना होता था, उस दिन वह बाजरा खिचड़ी ही खाता था। नवाबों के शासनकाल में 'शाही खिचड़ी' का संस्करण सामने आया। वाजिद अली शाह (1822-1887) के एक शेफ ने बादाम और पिश्ते से खिचड़ी बनाई थी। उसने बादाम को बारीक-बारीक काटकर चावल का आकार दिया था, जबकि पिश्ते को काटकर दाल का। 

 

बौद्ध भिक्षुओं की खास पसंद


खिचड़ी बौद्ध भिक्षुओं का भी पसंदीदा भोजन रहा। मध्यकाल में बौद्ध भिक्षु भिक्षा के लिए घर-घर जाते थे। अधिकांश को भिक्षा में दाल और चावल ही मिलते थे। कई बार उन्हें साथ में सब्जियां और मसाले भी मिल जाते थे। उन्हें जो भी मिलता था, वे सभी को एक बर्तन में एकसाथ मिलाकर उसे पका लेते थे। इस तरह खिचड़ी भी बौद्ध भिक्षुओं का प्रमुख खाना बन गई। देश में खिचड़ी का विस्तार करने में भी बौद्ध भिक्षुओं ने प्रमुख भूमिका निभाई। बौद्ध भिक्षुओं के साथ-साथ जैन, हिंदू और सूफी संतों के बीच भी खिचड़ी लोकप्रिय होती चली गई। 

 

पाचन तंत्र के लिए अच्छी मानी जाती है खिचड़ी


आयुर्वेद के अनुसार खिचड़ी ऐसी डिश है जो शरीर के तीनों दोषों- कफ, पित्त और वात को संतुलित करती है। आयुर्वेद में माना जाता है कि सेहत पाचन तंत्र से शुरू होता है। स्वस्थ रहने के लिए पूरा शरीर अच्छे पाचन पर निर्भर करता है। अगर हमारा पाचन तंत्र सही ढंग से काम नहीं करता है, तो हम कई बीमारियों के शिकार हो सकते हैं। पाचन ऊर्जा को 'अग्नि' कहते हैं। यह अग्नि बहुत ताकतवर होनी चाहिए। खिचड़ी इसी अग्नि को और भी तेज करती है और इस तरह हमारे सारे तंत्र को संतुलित बनाए रखती है। 
 

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