दुरुस्त हो रही है ओजोन पर्त, अंटार्कटिका पर आईआईटी खड़गपुर की रिसर्च ने भी की पुष्टि

3 वर्ष पहले
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हेल्थ डेस्क. सूर्य की हानिकारक अल्ट्रावॉयलेट (परबैंगनी) रेडिएशन से बचाने वाली ओजोन की परत में सकारात्मक बदलाव देखने को मिले हैं। यह धीरे-धीरे खुद को रिपेयर कर रही है। दुनिया के आधे उत्तरी हिस्से में ओजोन की पर्त 2030 तक खुद को रिपेयर कर लेगी। यह रिपोर्ट अमेरिका ने जारी की है। खास बात है कि अंटार्कटिका पर ओजोन परत सबसे ज्यादा खतरनाक स्थिति में थी यहां पर भी सुधार देखा जा रहा है। आईआईटी खड़गपुर ने भी अपनी हालिया रिसर्च में इसकी पुष्टि की है। रिपोर्ट के मुताबिक, शोधकर्ताओं ने 1979 से लेकर 2017 तक के आंकड़ों का अध्ययन किया। इसमें सामने आया कि अंटार्कटिका पर मौजूद ओजोन परत में 1987 में सबसे ज्यादा नुकसान देखा गया था। 2001 से 2017 तक परत में नुकसान का स्तर कम हुआ है। रिसर्च के मुताबिक परिणामों में अलग-अलग मौसम का डाटा शामिल किया गया है। 

 

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नासा वैज्ञानिक पॉल न्यूमैन के मुताबिक, अगर ओजोन लेयर को नुकसान पहुंचाने वाले तत्व बढ़ते रहे तो इसके खतरनाक नतीजे होंगे। नासा की मुताबिक, धरती से 7-25 मील ऊपर ओजोन परत है। यह पृथ्वी पर आने वाली सूर्य की नुकसान पहुंचाने वाली पराबैंगनी किरणों को रोकने का काम करती है। जो स्किन कैंसर, मोतियाबिंद का कारण बनने के साथ शरीर की रोगों से लड़ने की क्षमता और पौधों को नुकसान पहुंचाती हैं। वायुमंडल की ऊपरी सतह कुदरती तौर पर बनी ओजोन की परत को अच्छा माना जाता है। 

 

सफल रहा 196 देशों का मॉन्ट्रियल प्रोटोकाल 
वैज्ञानिकों ने 1970 में पहली बार ओजाेन की पतली होती परत की पहचान की थी। रिपोर्ट में बताया गया था कि इसका कारण रेफ्रिजरेटर और स्प्रे में मौजूद क्लोरोफ्लोरो कार्बन है। ओजोन लेयर में लगातार क्षति देखते हुए 1980 में 196 देशों ने मिलकर एक मसौदा तैयार किया। इसे मॉन्ट्रियल प्रोटोकाल कहा गया। जिसका मकसद दुनियाभर में क्लोरोफ्लोरो कार्बन का स्तर कम करना था। कई कंपनियों ने क्लोरोफ्लोरो कार्बन फ्री प्रोडक्ट बनाए और यह प्रयोग काफी कामयाब रहा। 

 

यूनाइटेड नेशन एन्वायरमेंट प्रोग्राम के प्रमुख एरिक सोल्हिम के अनुसार, करीब 30 साल इस प्रोटोकॉल के कारण ओजोन परत से जुड़े सकारात्मक परिणाम सामने आए। पर्यावरण का तापमान बढ़ाने वाली गैसें जिसे हाइड्रोफ्लोरोकार्बन के नाम से भी जाना जाता है, उन्हें भी कम करने की पहल की गई थी। ये गैसें रेफ्रिजरेटर, एयरकंडीशनर और कारों में पाई जाती हैं।